Vande Mataram Bill Row: संसद के दोनों सदनों से वंदे मातरम् बिल पारित होने के बाद देश में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। राज्यसभा और लोकसभा से मंजूरी मिलने के बाद अब यह विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति का इंतजार कर रहा है। इस बीच कई राजनीतिक दलों, धार्मिक संगठनों और सामाजिक समूहों ने इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। जहां बिल के समर्थक इसे राष्ट्रीय गीत के सम्मान और संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहे हैं, वहीं कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसके कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है और इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा विषय बताया है।

मुस्लिम संगठनों ने बिल के प्रावधानों पर जताई आपत्ति
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने वंदे मातरम् बिल के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। इन संगठनों का कहना है कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध किसी गीत या विचार को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि संविधान सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार जीवन जीने और पूजा-पद्धति अपनाने का अधिकार देता है। इसलिए किसी भी कानून को लागू करते समय इन संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाना आवश्यक है।

मौलाना अरशद मदनी ने धार्मिक मान्यताओं का दिया हवाला
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मुसलमानों को किसी व्यक्ति के वंदे मातरम् गाने या पढ़ने से कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि इस्लामी मान्यताओं के अनुसार मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी उपासना में किसी अन्य को शामिल नहीं कर सकता। उनके अनुसार, वंदे मातरम् के कुछ अंश इस्लामी आस्था के अनुरूप नहीं माने जाते, इसलिए किसी मुसलमान को इसे गाने या स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 का दिया गया हवाला
मौलाना मदनी ने अपने बयान में संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इसके साथ ही उन्होंने अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए कहा कि संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुनिश्चित करता है। उनका कहना है कि किसी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कोई नारा, गीत या विचार अपनाने के लिए मजबूर करना संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं होगा।
AIMPLB ने भी कानून को लेकर जताई चिंता
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इस विधेयक पर अपनी प्रतिक्रिया जारी की है। बोर्ड का कहना है कि यदि वंदे मातरम् को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाता है, तो यह धार्मिक और संवैधानिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्न खड़े कर सकता है। बोर्ड ने अपने बयान में कहा कि भारत विविध धर्मों और संस्कृतियों वाला देश है, इसलिए किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक विचार को सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू करने से पहले व्यापक संवैधानिक और सामाजिक पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।
वंदे मातरम् बिल में क्या हैं प्रमुख प्रावधान
वंदे मातरम् बिल को 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से मंजूरी मिली। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद यह विधेयक कानून का रूप ले लेगा। प्रस्तावित कानून के तहत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की तरह कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। बिल के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति वंदे मातरम् के गायन के दौरान जानबूझकर अपमान करता है, बाधा उत्पन्न करता है या कार्यक्रम में व्यवधान डालता है, तो उसके खिलाफ तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों प्रकार की सजा का प्रावधान किया गया है।
विरोध और समर्थन के बीच जारी है राजनीतिक बहस
विधेयक का विरोध करने वाले संगठनों और नेताओं का कहना है कि देश के सामने बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं और युवाओं के रोजगार जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन पर संसद को प्राथमिकता से चर्चा करनी चाहिए। दूसरी ओर, बिल के समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत को सम्मान और कानूनी संरक्षण प्रदान करना है। फिलहाल यह विधेयक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि यह कानून कब से प्रभावी होगा और इसके प्रावधान किस प्रकार लागू किए जाएंगे।











