Tablighi Jamaat Case : साल 2020 में कोरोना महामारी के शुरुआती दौर में तब्लीगी जमात और इसके प्रमुख मौलाना साद को लेकर देशभर में बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। उन पर महामारी फैलाने और लॉकडाउन नियमों का उल्लंघन करने जैसे गंभीर आरोप लगे थे। लेकिन अब लगभग पांच साल बाद दिल्ली पुलिस की जांच और कोर्ट के फैसले ने मौलाना साद को बड़ी राहत दी है। पुलिस ने उन्हें इस मामले में पाक-साफ बताया है, जबकि दिल्ली हाई कोर्ट ने जमात से जुड़े 70 लोगों के खिलाफ दर्ज 16 एफआईआर को खारिज कर दिया है।
मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के चलते देशभर में सख्त लॉकडाउन लागू था। इस दौरान तब्लीगी जमात का सालाना इज्तिमा दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में आयोजित हुआ। आरोप लगाया गया कि मौलाना साद ने सोशल मीडिया और निजी संपर्कों के जरिए देश-विदेश से जमातियों को बुलाया और मरकज में बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा कर कोविड नियमों का उल्लंघन किया।
इसके बाद दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन थाने में तत्कालीन इंस्पेक्टर ने मौलाना साद और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। मामले ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर बड़ी बहस छेड़ दी थी।
करीब पांच साल चली लंबी जांच के बाद दिल्ली पुलिस ने मौलाना साद को क्लीन चिट दे दी है। जांच के दौरान पुलिस ने मौलाना का लैपटॉप जब्त किया और उसमें मौजूद उनके भाषणों की फॉरेंसिक जांच कराई।
पुलिस का कहना है कि: मौलाना साद के बयान इस्लाम धर्म से संबंधित शिक्षाओं से जुड़े थे। इनमें कहीं भी कोविड नियमों को तोड़ने या सरकार विरोधी बातें नहीं पाई गईं।उनके भाषणों में लोगों को अच्छे कार्य करने और बुराई से बचने की नसीहत दी गई थी। हालांकि पुलिस सूत्रों का यह भी कहना है कि मौलाना साद अभी तक जांच में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हुए हैं। उनके अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच अब भी लंबित है।
जुलाई 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने तब्लीगी जमात से जुड़े 70 विदेशी नागरिकों के खिलाफ दर्ज 16 एफआईआर को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि: कोविड गाइडलाइन जारी होने से पहले ही ये लोग मरकज में रह रहे थे। इन्होंने जानबूझकर कोई उल्लंघन नहीं किया। सरकार की तरफ से अचानक लॉकडाउन की घोषणा हुई, जिससे लोग बाहर नहीं निकल सके। कोर्ट ने माना कि यह मामला कोविड के शुरुआती भ्रम और कम्युनिकेशन गैप का नतीजा था।
तब्लीगी जमात विवाद में मौलाना साद को क्लीन चिट और हाई कोर्ट का फैसला इस बात की ओर इशारा करता है कि उस दौर में फैली अफवाहों और जल्दबाज़ी में किए गए कुछ कानूनी फैसलों पर पुनर्विचार की जरूरत थी।
जहां एक ओर इस प्रकरण ने कई लोगों को सामाजिक बहिष्कार और कानूनी लड़ाई झेलने को मजबूर किया, वहीं अब इन फैसलों ने उन्हें राहत दी है। मौलाना साद का यह मामला एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है कि किसी भी आपदा के दौरान कानून और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि पूर्वाग्रहों के आधार पर।
LPG Price Hike: मई महीने की शुरुआत के साथ ही आम आदमी की रसोई पर…
Health Tips: ड्राई फ्रूट्स की दुनिया में मुनक्का एक ऐसा नाम है, जिसे आयुर्वेद में…
India-Bangladesh Row: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की हालिया टिप्पणियों ने भारत और बांग्लादेश…
Silent Killer: "मैं सालों से सिगरेट पी रहा हूं और मुझे आज तक कुछ नहीं…
Kailash Mansarovar Yatra 2026: शिव भक्तों और आध्यात्मिक साधकों के लिए एक बड़ी और सुखद…
3 Idiots Fame Millimeter: राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी फिल्म '3 इडियट्स' भारतीय सिनेमा…
This website uses cookies.