Modi govt jobs data : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। इस हिसाब से अब तक यानी 11 साल में कुल 22 करोड़ नौकरियां दी जानी चाहिए थीं। लेकिन ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 11 साल में केवल 22 लाख सरकारी पद ही भरे गए हैं। हाल ही में संसद की कार्मिक संबंधी स्थायी समिति की बैठक में सरकारी अधिकारियों द्वारा दी गई प्रेजेंटेशन में खुलासा हुआ कि 2014 से 2025 तक केवल 22 लाख सरकारी नियुक्तियाँ हुई हैं। इनमें से भी 5 लाख नियुक्तियाँ सिर्फ रेलवे विभाग में हुई हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार यह जानकारी तक नहीं दे पाई कि कुल कितने सरकारी पद अभी खाली हैं। विपक्षी सांसदों ने इस पर लगातार सवाल पूछे, लेकिन सरकारी अधिकारी सटीक जवाब नहीं दे सके।समिति अध्यक्ष बृजलाल ने अधिकारियों को अगली बैठक में पूरा ब्यौरा देने का निर्देश दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में एक रोजगार मेले में दावा किया कि उनकी सरकार ने सरकारी और निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन पर जोर दिया है। सरकार का दावा है कि अब तक देश भर में 16 रोजगार मेला आयोजित किए जा चुके हैं, जिनमें लाखों युवाओं को नियुक्ति पत्र दिए गए हैं।लेकिन इन मेलों से सरकारी रिक्तियों की भरपाई कितनी हुई, यह स्पष्ट नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय और DMK सांसद विल्सन सहित कई विपक्षी सांसदों ने बैठक में यह सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री का हर साल 2 करोड़ नौकरी देने का वादा अब तक कैसे पूरा नहीं हुआ। उन्होंने यह भी पूछा कि 2024 में तीसरी बार सत्ता में आने के बाद, अब तक सरकार ने कितनी नौकरियाँ दी हैं। सरकारी अधिकारियों के अस्पष्ट जवाबों से समिति असंतुष्ट रही। बार-बार पूछे जाने पर भी रिक्त पदों की संख्या या नई भर्तियों का वार्षिक ब्यौरा नहीं दिया गया। अब इन सवालों के जवाब अगली समिति बैठक में पेश करने का आदेश दिया गया है।
लोकसभा चुनाव से पहले भी बेरोज़गारी का मुद्दा विपक्ष की बड़ी रणनीति रहा है। कांग्रेस समेत कई दलों ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि विकास का दावा केवल प्रचार तक सीमित है। सरकार ने जवाब में रोजगार मेलों और स्कीमों का हवाला दिया, लेकिन आंकड़े अब भी सवालों के घेरे में हैं। मोदी सरकार ने जब सत्ता संभाली थी, तब युवाओं को बड़े रोजगार वादे के भरोसे जोड़ा गया था।अब जब 22 करोड़ नौकरियों की जगह केवल 22 लाख नियुक्तियाँ हुई हैं, तो यह साफ है कि सरकारी नौकरियों में भरती की रफ्तार बेहद धीमी रही है और रिक्त पदों की स्थिति तक स्पष्ट नहीं होना, नीति और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
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