Mohan Bhagwat
Mohan Bhagwat: नागपुर में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के नए कार्यालय की आधारशिला रखने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने वैश्विक संकटों और भारत की भूमिका पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान में दुनिया जिस विनाशकारी मोड़ पर खड़ी है, वहां से केवल भारतीय जीवन दर्शन ही मानवता को बचा सकता है।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया भर में जारी युद्ध और तनाव का असली कारण मानवीय स्वार्थ और दूसरों पर वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक लोग अपनी व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्वार्थों को नहीं छोड़ेंगे, तब तक स्थायी शांति एक सपना ही बनी रहेगी। उनके अनुसार, दुनिया पिछले 2,000 वर्षों से विभिन्न विचारधाराओं के माध्यम से शांति खोजने का प्रयास कर रही है, लेकिन धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण और ऊंच-नीच की भावना के कारण ये सभी प्रयास विफल रहे हैं।
संघ प्रमुख ने विश्वास व्यक्त किया कि आज पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आवाज उठ रही है कि केवल भारत ही चल रहे भीषण युद्धों को रोकने की क्षमता रखता है। भारत की विशेषता ‘सब एक हैं’ के भाव में निहित है। भागवत ने कहा कि भारत ने हमेशा ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ के बजाय ‘समन्वय और सह-अस्तित्व’ को प्राथमिकता दी है। यदि भारत के प्राचीन ज्ञान और धर्म का पालन किया जाए, तो विश्व को विनाश की ओर बढ़ने से रोका जा सकता है।
डॉ. भागवत ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म केवल पवित्र ग्रंथों या शास्त्रों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह मनुष्य के दैनिक व्यवहार और आचरण में झलकना चाहिए। उन्होंने अनुशासन और नैतिक मूल्यों पर बल देते हुए कहा कि इनके पालन के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। कई बार सही मार्ग पर चलने के लिए व्यक्तिगत कठिनाइयां भी उठानी पड़ती हैं, लेकिन यही त्याग समाज और विश्व में सौहार्द लाता है। उनके अनुसार, एकता और अनुशासन ही शांति के आधार स्तंभ हैं।
एक दिलचस्प पहलू रखते हुए भागवत ने कहा कि आधुनिक विज्ञान भी अब धीरे-धीरे उसी निष्कर्ष पर पहुँच रहा है जो भारत का प्राचीन ज्ञान सदियों पहले दे चुका है—कि पूरा ब्रह्मांड परस्पर जुड़ा हुआ है। जहां दुनिया के अन्य देश ‘शक्ति’ (Might is Right) को सर्वोपरि मानते हैं, वहीं भारत ‘मानवता’ को केंद्र में रखता है। उन्होंने भारतीय संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें दिए गए चित्र हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपरा के प्रतीक हैं, जो हमें सभी को एकजुट करने की प्रेरणा देते हैं।
अंत में, सरसंघचालक ने मानवता से आह्वान किया कि वह संघर्ष के मार्ग को छोड़कर सहयोग और सौहार्द की ओर बढ़े। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांति कोई बाहरी वस्तु नहीं है, बल्कि यह अच्छे मूल्यों और निस्वार्थ जीवन शैली का परिणाम है। भारत की शक्ति उसकी एकजुटता में है, और यही एकजुटता विश्व के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य करेगी।
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