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Mohan Bhagwat Savarkar: “हमारे देश में ‘तेरे टुकड़े हों’ जैसी भाषा नहीं होनी चाहिए”: मोहन भागवत

Mohan Bhagwat Savarkar : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को दक्षिण अंडमान के बेओदनाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान वीर सावरकर के चरित्र की सराहना की और देश में बढ़ते टकराव पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमारे अपने देश में, हमारे देश के प्रति भक्ति होनी चाहिए, यहाँ पर ‘तेरे टुकड़े हों’ जैसी विघटनकारी भाषा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जब पूरा भारत देश को एक मानकर चलता है और हमारा संविधान भी यही कहता है, तो छोटी-छोटी बातों को लेकर टकराव क्यों होता है।

Mohan Bhagwat Savarkar : सावरकर के चरित्र में मिलती है पूर्णता

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि हम जिस व्यक्ति का अनुकरण करना चाहते हैं, उसका चरित्र पूर्ण होना चाहिए, अन्यथा हम उसकी ग़लत बातों का भी अनुकरण करने लगेंगे।

उन्होंने वीर सावरकर के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि उनके चरित्र में पूर्णता मिलती है। भागवत ने कहा कि सावरकर जी के पास सब प्रकार की प्रतिभा थी और उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए कई विश्लेषणों की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि सावरकर की कविताओं को देखेंगे तो उनकी एक-एक कविता में उनके व्यक्तित्व का एक पहलू मिलता है। उन्होंने कहा कि सावरकर की भक्ति, प्रेम और समर्पण की भावना इतनी शुद्ध थी कि आदमी उनसे जुड़कर तन्मय हो जाता है।

Mohan Bhagwat Savarkar : मातृभूमि के प्रति समर्पण ही जीवन का उद्देश्य

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सावरकर की भक्ति का सार यह था कि उनका देश का दुःख ही उनका व्यक्तिगत दुःख बन जाता था। भागवत ने कहा, “देश की वेदना, देश का दुख, देश के हित के लिए प्रयास, यही उसके जीवन का प्रयास बन जाता है।”उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी तन्मयता शुद्ध सात्विक प्रेम के कारण ही आती है। उन्होंने सवाल किया, “मातृभूमि से प्रेम नहीं करना, वह कैसे पुत्र कहला सकता है?” भागवत ने कहा कि हम सावरकर जी का स्मरण उनके इसी अटल देशभक्ति के लिए करते हैं।

छोटे स्वार्थों के कारण होता है टकराव

मोहन भागवत ने देश में हो रहे टकरावों पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब हमारा संविधान और पूरा देश हमें एक मानकर चलता है, तो इस भारत में छोटी-छोटी बातों को लेकर टकराव कैसे होता है? उन्होंने ज़ोर दिया कि सावरकर जी ने कभी ऐसा नहीं सोचा था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह टकराव तब पैदा होता है जब लोग अपने-अपने छोटे-छोटे स्वार्थों को प्राथमिकता पर रखकर चलते हैं। उन्होंने कहा कि यह निश्चय करना पड़ता है कि यदि चलते-चलते रास्ते में स्वार्थों को छोड़ना पड़े, तो उन्हें अर्पण कर देना पड़ेगा।

प्राथमिकता ‘राष्ट्र’ है: सावरकर की हिंदू राष्ट्र की कल्पना

मोहन भागवत ने कहा कि हमारी प्राथमिकता हमारा भारत है, हमारा राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र क्या है, इसकी स्पष्ट कल्पना सावरकर जी ने दी है। उन्होंने इसे हिंदू राष्ट्र कहा है। भागवत ने कहा कि सावरकर ने हिंदू की व्याख्या भी बताई: “प्रत्येक व्यक्ति देश के लिए जिए, स्वयं देश होकर जिए, भारत बने, भारत को जाने।”

भागवत ने सभी से आह्वान किया कि जीवन का एक उद्देश्य देश के लिए समर्पित होना है। उन्होंने कहा कि यह भक्ति ही हमें सब कुछ सहन करने की पूरी शक्ति देती है। उन्होंने कहा कि हमारा शाश्वत स्वरूप धर्मप्राण स्वरूप है, और हमें देश को परम वैभव संपन्न बनाना है।

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