RSS chief speech 2026 : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर अपने संबोधन में भारत की सामाजिक एकता, लोकतांत्रिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार रखे। उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल सत्ता या शासन व्यवस्था बदलने से किसी देश की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो जाता। उनके मुताबिक, भारत को भी ऐसे घटनाक्रमों से सबक लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है।
भारत में भी ऐसे प्रयासों को लेकर जताई चिंता
मोहन भागवत ने कहा कि भारत में भी देश की व्यवस्था और सामाजिक एकता को प्रभावित करने के प्रयास होते रहते हैं। उन्होंने दावा किया कि कुछ ताकतें भारत, हिंदू समाज और संघ को कमजोर करने की कोशिश करती हैं। उनके अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में स्वार्थ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है। हालांकि, इन दावों के समर्थन में संबोधन के दौरान कोई विशिष्ट उदाहरण नहीं दिया गया।
आंदोलन समाधान के लिए हों, समाज में द्वेष न बढ़ाएं
संघ प्रमुख ने लोकतंत्र में आंदोलनों की भूमिका पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और आंदोलन स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए। वोट हासिल करने, सस्ती लोकप्रियता पाने और राजनीतिक लाभ उठाने की लालसा समाज की सद्भावना पर हावी नहीं होनी चाहिए। भागवत के मुताबिक, सामाजिक समस्याओं का स्थायी समाधान केवल आंदोलनों से नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक प्रयासों और रचनात्मक पहल से संभव है।
वंदे मातरम् को राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा बताया
मोहन भागवत ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय एकता की महत्वपूर्ण प्रेरणा बताते हुए इसे गर्व और बिना संकोच के गाने की अपील की। उन्होंने कहा कि अलगाववाद, राजनीतिक वर्चस्व की इच्छा और तुष्टीकरण की मानसिकता ने राष्ट्रीय एकता के आधारों को कमजोर किया तथा देश के विभाजन में योगदान दिया। उनके अनुसार, विभाजन के बाद भी क्षेत्र में अपेक्षित शांति स्थापित नहीं हुई और अविश्वास, असुरक्षा तथा संघर्षों की स्थिति बनी रही।
भारत को जोड़ने वाले तीन महत्वपूर्ण सूत्र
भागवत ने भारत की एकता के लिए तीन प्रमुख आधार बताए। इनमें भारत के प्रति भक्ति, साझा पूर्वजों के जीवन और विरासत पर गौरव तथा भारतीय संस्कृति और उसके वैश्विक मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता शामिल हैं। उन्होंने लोगों से छोटी-छोटी पहचानों के कारण पैदा होने वाले भय, संकीर्ण अहंकार और विविधता को अलगाव समझने की प्रवृत्ति से बचने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि विश्व की समस्याओं के समाधान में भारत की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और देश दूसरे राष्ट्रों से उपयोगी संगठन-कौशल भी सीख सकता है।
नई पीढ़ी को तकनीक और ज्ञान के लिए तैयार करने पर जोर
संघ प्रमुख ने नई पीढ़ी की तैयारी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि विश्वगुरु बनने की बात करने वाले भारत को अपनी भावी पीढ़ियों को जिम्मेदारी निभाने के योग्य बनाना होगा। उन्होंने ज्ञान और तकनीक को स्वीकार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल सामग्री के संदर्भ में भी उन्होंने शासन तथा संबंधित पक्षों से विचार करने की बात कही।
संघ की भूमिका और हिंदू समाज के प्रति दृष्टिकोण
भागवत ने कहा कि विवाद या झगड़े पैदा करने वाले लोग अलग-अलग घटनाओं को अपने तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं और कई बार ऐसे मामलों में संघ का नाम भी सामने लाया जाता है। उन्होंने संघ का किसी विवाद से संबंध होने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संगठन अपना काम करता है। उनके अनुसार, संघ का प्रेम हिंदू समाज के प्रति है और हिंदू की अवधारणा में संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने का विचार शामिल है।
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