NATO chief warning : नाटो महासचिव मार्क रूटे ने भारत, चीन और ब्राज़ील को सीधे तौर पर चेतावनी दी है कि अगर इन देशों ने रूस से व्यापार जारी रखा, विशेषकर तेल और ऊर्जा क्षेत्र में, तो उन्हें अमेरिका की ओर से 100 प्रतिशत सेकेंडरी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। अमेरिकी कांग्रेस में सांसदों के साथ हुई मुलाकात के दौरान रूटे ने इन देशों से आग्रह किया कि वे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाएं कि वह शांति वार्ता को गंभीरता से लें।
रूटे ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “अगर आप भारत के प्रधानमंत्री हैं, चीन के राष्ट्रपति हैं, या ब्राज़ील के नेता हैं, तो आपको इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।” उन्होंने आगे कहा, “मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप पुतिन को कॉल करें और कहें कि वह शांति समझौते को स्वीकार करें। वरना इसका बुरा असर आपके देश पर पड़ सकता है।” रूटे की यह टिप्पणी अमेरिकी दबाव नीति का विस्तार है, जो रूस को अलग-थलग करने की रणनीति के तहत बनाई गई है।
नाटो प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि यूरोपीय देश यूक्रेन की सैन्य शक्ति को और मजबूत करने के लिए हर संभव सहायता करेंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका यूक्रेन को बड़े पैमाने पर हथियारों की सप्लाई करेगा, जिसका खर्च यूरोपीय देशों द्वारा वहन किया जाएगा। रूटे ने यह बयान ऐसे समय दिया जब अमेरिका और यूरोप मिलकर यूक्रेन को रूस के खिलाफ निर्णायक स्थिति में लाने की कोशिश कर रहे हैं।
जब रूटे से पूछा गया कि क्या यूक्रेन को लंबी दूरी की मिसाइलें भी दी जाएंगी, तो उन्होंने कहा, “यह सिर्फ डिफेंसिव नहीं, बल्कि अटैकिंग सपोर्ट भी होगा। इसमें हर प्रकार के हथियार शामिल हो सकते हैं।” हालांकि उन्होंने इस पर विस्तृत जानकारी देने से परहेज किया और कहा कि इस पर अब पेंटागन, यूरोपीय कमांड और यूक्रेनी नेतृत्व के बीच समन्वय से निर्णय होगा। इस बयान से स्पष्ट होता है कि नाटो अब सिर्फ डिफेंस तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि युद्ध को निर्णायक मोड़ पर ले जाने की कोशिश कर रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि 50 दिनों में शांति समझौता नहीं होता, तो रूस से सामान खरीदने वाले देशों पर 100% सेकेंडरी टैरिफ लगाए जाएंगे।
रूटे का यह बयान उस धमकी को और धार देता है और यह दिखाता है कि अमेरिका और उसके सहयोगी अब रूस के साथ व्यापार कर रहे देशों पर सामूहिक दबाव बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं।
भारत ने यूक्रेन युद्ध के दौरान एक तटस्थ और संतुलित कूटनीति अपनाई है। उसने रूस से सस्ते तेल की खरीद बढ़ाई है, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी हुई हैं। अमेरिका और नाटो की इस नई नीति के तहत भारत को अब एक कूटनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ सकता है—अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और रूस के साथ आर्थिक सहयोग के बीच संतुलन बनाए रखना।
चीन, रूस का सबसे बड़ा आर्थिक और रणनीतिक सहयोगी है। दोनों देशों ने डॉलर के बगैर लेन-देन की प्रणाली विकसित की है। ब्राज़ील, रूस से खाद्य और उर्वरक जैसे उत्पादों के लिए निर्भर है। ऐसे में इन दोनों देशों के लिए भी ट्रंप और रूटे की चेतावनी नई आर्थिक मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
इन देशों को अब यह तय करना होगा कि वे अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध बचाना चाहते हैं या रूस के साथ।
सेकेंडरी प्रतिबंध किसी भी देश की कंपनियों और संस्थानों को मजबूर करते हैं कि वे या तो अमेरिका से व्यापार करें या प्रतिबंधित देश (जैसे रूस) से।
यदि ये प्रतिबंध लागू होते हैं, तो इससे वैश्विक सप्लाई चेन में विघटन, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, और वैश्विक मंदी की आशंका बढ़ सकती है।
भारत, चीन, ब्राज़ील जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
रूटे के बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि नाटो और अमेरिका का उद्देश्य यह है कि रूस को युद्ध में कमजोर करके ही शांति समझौते की मेज पर लाया जाए।
यूक्रेन को हथियार देकर उसकी स्थिति को इतना मजबूत किया जाएगा कि वह रूस से समझौते की शर्तें तय कर सके। यह रणनीति रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर दबाव डालकर पुतिन को अलग-थलग करने की है।
ट्रंप और रूटे के बयानों से स्पष्ट है कि रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई में तब्दील हो गया है।भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों के लिए यह समय अत्यंत रणनीतिक सोच और चतुर कूटनीति का है, क्योंकि अमेरिका की नज़र अब सिर्फ रूस पर नहीं बल्कि उसके सहयोगियों पर भी है। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि ये देश दबाव में झुकेंगे या स्वतंत्र नीति अपनाएंगे।
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