Naxalite Sujata Surrender: छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी है। नक्सल आंदोलन की प्रमुख चेहरा और एक करोड़ रुपये की इनामी महिला नक्सली सुजाता ने शनिवार को तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। यह नक्सल संगठन के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। सुजाता साउथ सब जोनल ब्यूरो (SSZB) की प्रभारी थी और उसे नक्सल संगठन की सेंट्रल कमेटी में अहम स्थान प्राप्त था।

किशनजी की पत्नी और नक्सल थिंक टैंक रही है सुजाता
सुजाता नक्सल कमांडर किशनजी की पत्नी है, जो कभी संगठन का शीर्ष चेहरा था और बंगाल का प्रभारी रहा। 2011 में किशनजी की बेंगलुरु में ग्रेहाउंड्स द्वारा मुठभेड़ में मौत हो गई थी। सुजाता न सिर्फ किशनजी की पत्नी थी, बल्कि संगठन की रणनीतिक योजनाओं की प्रमुख योजनाकार भी रही है। उसे नक्सलियों का थिंक टैंक माना जाता था।

बस्तर के जंगलों में काटा जीवन
सुजाता का अधिकांश जीवन बस्तर के जंगलों में ही बीता है। वह तर्रेम थाना क्षेत्र के भट्टीगुड़ा, तुमलपाट, और मीनागुट्टा के इलाकों में सक्रिय रही है। नक्सल आंदोलन में उसका नाम कई भयानक हमलों से जुड़ा रहा है।
इन हमलों में रहा सुजाता का हाथ
2007, एर्राबोर: 23 जवान शहीद
2010, ताड़मेटला: 76 जवान बलिदान
2010, गादीरास: 36 की हत्या
2013, झीरम घाटी हमला: 31 की मौत
2017, चिंतागुफा: 25 जवान शहीद
2020, मिनपा और टेकुलगुड़ेम: 38 जवान बलिदान
इन सभी घटनाओं में सुजाता की भूमिका निर्णायक रही है।
कई नामों से पहचान
नक्सल संगठन में सुजाता के कई नाम हैं—पद्मा, कल्पना, सुजातक्का, झांसीबाई, और मैनीबाई। बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में वह अलग-अलग नामों से जानी जाती थी।
भाषाओं की जानकार और शिक्षित
12वीं तक शिक्षित सुजाता अंग्रेजी, हिंदी, बंगाली, ओडिया, तेलुगु, और गोंडी, हल्बी जैसी स्थानीय बोलियों में भी माहिर है। इससे उसे विभिन्न क्षेत्रों में संगठन को फैलाने में मदद मिली।
पहले अफवाह, अब सच
2024 में उसकी गिरफ्तारी की खबरें आई थीं, लेकिन उसने खुद इसका खंडन किया था। अब आखिरकार 13 सितंबर 2025 को उसने सार्वजनिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया है।
मुख्यधारा में लौटने की अपील
सुजाता के साथ तीन अन्य नक्सलियों ने भी सरेंडर किया है। आत्मसमर्पण के दौरान उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की अपील की।सुजाता का आत्मसमर्पण न केवल सुरक्षा बलों की बड़ी जीत है, बल्कि यह उन नक्सलियों के लिए एक संदेश भी है जो अब भी जंगलों में हैं। सरकार और पुलिस की पुनर्वास नीतियों के चलते अब कई नक्सली मुख्यधारा में लौटने का फैसला ले रहे हैं।
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