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NCERT controversy: क्या बच्चों को सिखाया जा रहा था गलत इतिहास? सुप्रीम कोर्ट ने लेखकों को किया बाहर

NCERT controversy: एनसीईआरटी (NCERT) की पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार को लेकर शामिल किए गए एक विवादित अध्याय ने देश के कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने पाठ्यक्रम में न्यायपालिका की छवि धूमिल करने के प्रयास पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने इसे केवल एक गलती नहीं, बल्कि एक गंभीर चूक माना है। इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित अध्याय तैयार करने वाले तीन प्रमुख व्यक्तियों को भविष्य में किसी भी सरकारी परियोजना या सार्वजनिक धन से जुड़ी जिम्मेदारी से तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित करने का आदेश दिया है।

लेखकों पर लगा ‘लाइफटाइम’ प्रतिबंध: प्रोफेसर डैनिनो समेत तीन बाहर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से तीन नामों का उल्लेख किया है, जिन्हें अब स्कूली पाठ्यक्रम तैयार करने की किसी भी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा। इनमें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार शामिल हैं। अदालत ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और विश्वविद्यालयों को सख्त हिदायत दी है कि इन व्यक्तियों को भविष्य में शिक्षा से संबंधित किसी भी आधिकारिक कार्य में शामिल न किया जाए। कोर्ट का मानना है कि पाठ्यक्रम तैयार करना एक अत्यंत जिम्मेदारी भरा कार्य है और इसमें ऐसी किसी भी सामग्री को स्थान नहीं दिया जा सकता जो संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अनादर पैदा करे।

उच्च स्तरीय समिति की निगरानी में होगा नया पाठ्यक्रम

अदालत ने केवल प्रतिबंध ही नहीं लगाया, बल्कि सुधार की दिशा में भी कदम उठाए हैं। आदेश के अनुसार, यदि ‘अध्याय IV’ को दोबारा लिखा गया है, तो उसे तब तक प्रकाशित नहीं किया जाएगा जब तक कि एक नई विशेषज्ञ समिति उसे अपनी अंतिम मंजूरी न दे दे। सरकार को एक सप्ताह के भीतर एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया है। इस समिति में एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक प्रतिष्ठित विद्वान और एक ख्याति प्राप्त वकील शामिल होंगे। कोर्ट ने एनसीईआरटी को सुझाव दिया है कि वे समिति में किसी प्रमुख न्यायविद् को भी शामिल करें, ताकि न्यायपालिका से जुड़े तथ्यों की शुद्धता सुनिश्चित की जा सके।

नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी और NSTC की भूमिका पर निर्देश

शिक्षा के गिरते स्तर और विवादास्पद सामग्री को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (भोपाल) को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। अब से उच्च कक्षाओं के कानूनी पाठ्यक्रम तय करने की प्रक्रिया में इस एकेडमी की भागीदारी अनिवार्य होगी। इसके अलावा, नेशनल सिलेबस एंड टीचिंग लर्निंग मटेरियल कमेटी (NSTC) के उन सदस्यों की भूमिका पर भी पुनर्विचार करने के निर्देश दिए गए हैं, जिन्होंने विवादित चैप्टर के प्रकाशन से पहले उसे हरी झंडी दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पाठ्यक्रम की समीक्षा में हुई चूक के लिए जवाबदेही तय की जाएगी।

मीडिया की नकारात्मक टिप्पणियों पर भी गिरेगी गाज

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी साफ किया कि वह रचनात्मक आलोचना के विरुद्ध नहीं है, लेकिन अपमानजनक भाषा और संवेदनहीन टिप्पणियों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को उन मीडिया संस्थानों और पोर्टल्स की पहचान करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने इस मामले को लेकर न्यायपालिका के विरुद्ध अपमानजनक बातें की हैं। कोर्ट ने सख्त लहजे में चेतावनी दी कि ऐसे तत्व चाहे देश में हों या विदेश में, उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। यह संदेश स्पष्ट है कि प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ संस्थाओं की मर्यादा को भंग करना नहीं है।

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