नौकरी/ शिक्षा

NEET PG 2025 Cut off: NEET-PG 2025 कट-ऑफ में ऐतिहासिक गिरावट, अब शून्य अंक वाले भी बनेंगे विशेषज्ञ डॉक्टर

NEET PG 2025 Cut off : भारत की सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा परीक्षाओं में से एक, NEET-PG 2025 को लेकर केंद्र सरकार और नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसने पूरे देश के चिकित्सा जगत को हैरान कर दिया है। तीसरे दौर की काउंसलिंग के लिए कट-ऑफ में अभूतपूर्व कटौती की गई है। इस बदलाव के बाद अब वे उम्मीदवार भी पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) की सीटों के लिए पात्र हो गए हैं, जिनके अंक बेहद कम या नकारात्मक (Negative) हैं। सरकार के इस कदम को जहां खाली सीटों को भरने की एक कोशिश माना जा रहा है, वहीं चिकित्सा विशेषज्ञों ने शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य के डॉक्टरों की दक्षता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

पुराने नियम और पात्रता का मापदंड

13 जनवरी 2026 से पहले तक, NEET-PG में दाखिले के लिए एक सम्मानजनक न्यूनतम स्कोर अनिवार्य था। सामान्य और ईडब्ल्यूएस वर्ग के उम्मीदवारों को काउंसलिंग में बैठने के लिए कम से कम 50वां परसेंटाइल (लगभग 276 अंक) लाना होता था। आरक्षित वर्गों (SC, ST, OBC) के लिए यह सीमा 40वां परसेंटाइल यानी कम से कम 235 अंक निर्धारित थी। इसका सीधा मतलब था कि विशेषज्ञता हासिल करने की दौड़ में शामिल होने के लिए एक बुनियादी योग्यता की आवश्यकता थी, ताकि केवल मेधावी छात्र ही भविष्य के सर्जन या फिजिशियन बन सकें।

नए नियमों का गणित: शून्य परसेंटाइल तक गिरी पात्रता

NBEMS के ताजा नोटिस ने पूरी पात्रता प्रणाली को उलट दिया है। नए बदलावों के अनुसार:

  • जनरल और EWS: कट-ऑफ को 50वें से घटाकर सीधे 7वें परसेंटाइल (लगभग 103 अंक) पर ला दिया गया है।

  • SC, ST और OBC: इन श्रेणियों के लिए कट-ऑफ को घटाकर शून्य परसेंटाइल कर दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि जिन उम्मीदवारों के अंक -40 (नेगेटिव) तक भी हैं, वे भी अब काउंसलिंग में भाग लेकर विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की सीट हासिल कर सकते हैं। हालांकि, बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि इससे केवल काउंसलिंग की पात्रता बदली है, मूल मेरिट रैंक वही रहेगी।

सीटों का खाली रहना: सरकार के फैसले की मुख्य वजह

सरकार और एनबीईएमएस ने इस फैसले के पीछे तर्क दिया है कि पहले और दूसरे राउंड की काउंसलिंग के बाद भी देशभर में हजारों पीजी सीटें खाली रह गई थीं। एक ओर देश डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है और दूसरी ओर महंगे बुनियादी ढांचे वाली विशेषज्ञ सीटें खाली पड़ी हैं, जिसे सरकार एक बड़ा ‘रिसोर्स वेस्ट’ मान रही है। इस विरोधाभास को खत्म करने और मेडिकल कॉलेजों की ट्रेनिंग सीटों को शत-प्रतिशत भरने के उद्देश्य से यह ‘जीरो परसेंटाइल’ जैसा कदम उठाया गया है।

आखिर क्यों पीजी सीटों से दूरी बना रहे हैं डॉक्टर?

मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, सीटों के खाली रहने के पीछे कई गंभीर सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस इतनी अधिक है कि मध्यम वर्गीय छात्र वहां दाखिला नहीं ले पाते। इसके अलावा, कई राज्यों में पीजी के बाद कठिन ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने के कड़े ‘सरकारी बॉन्ड’ और रेजिडेंट डॉक्टरों पर काम का अत्यधिक बोझ भी छात्रों को हतोत्साहित कर रहा है। सर्जरी और एनेस्थीसिया जैसी चुनौतीपूर्ण शाखाओं में कानूनी जोखिम और सुरक्षा की कमी के कारण भी डॉक्टर इन सीटों को छोड़ने को मजबूर हैं।

चिकित्सा गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर चिंता

इस फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। चिकित्सा संगठनों का तर्क है कि पीजी छात्र ही भविष्य के सुपर स्पेशलिस्ट बनते हैं। यदि प्रवेश का स्तर इतना नीचे गिरा दिया गया, तो इलाज की गुणवत्ता और चिकित्सा नैतिकता पर बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, सरकार का पक्ष है कि ये उम्मीदवार पहले ही एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर चुके हैं, इसलिए उनकी बुनियादी समझ पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए।

भविष्य के विशेषज्ञों के लिए एक नई चुनौती

NEET-PG परीक्षा भारत में विशेषज्ञ डॉक्टर बनने का एकमात्र द्वार है। एमडी (MD) और एमएस (MS) जैसे कोर्स देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं। अब देखना यह होगा कि कट-ऑफ घटाने का यह फैसला स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती प्रदान करता है या केवल कागजों पर सीटों की संख्या को भरने तक सीमित रह जाता है।

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