Chhattisgarh murder convict: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पा चुका एक फरार कैदी मुकेश कांत आत्मसमर्पण के बाद भी जेल नहीं पहुंच सका। इसके बजाय वह अब बिलासपुर के सिम्स अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती है। इस पूरी घटना ने राज्य की पुलिस और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

फरारी के बाद कलेक्टर के सामने आत्मसमर्पण
मुकेश कांत, जिसे वर्ष 2013 में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, फरवरी 2025 से अंबिकापुर केंद्रीय जेल में था। करीब 8 महीने बाद 04 अक्टूबर शनिवार को उसे इलाज के लिए अस्पताल दाखिल कराया गया था जहाँ से अगले दिन वह फरार हो गया। मंगलवार 07 अक्टूबर की शाम उसने बिलासपुर कलेक्टर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। कलेक्टर ने नियमानुसार उसे पुलिस के हवाले कर दिया, और पुलिस ने जेल भेजने की प्रक्रिया शुरू की।

लेकिन जेल नहीं, पहुंच गया घर
यहां से शुरू होती है प्रशासन की चौंकाने वाली लापरवाही। पुलिस द्वारा पूछताछ के बाद न तो मुकेश का नाम किसी रजिस्टर में दर्ज किया गया, न ही उसे जेल में औपचारिक रूप से दाखिल किया गया। हैरानी की बात यह रही कि उसे थाने के बाहर ही छोड़ दिया गया, जिसके बाद वह अपने परिवार के साथ घर चला गया।
गिरफ्तारी के डर से उठाया खौफनाक कदम
बुधवार को जब अंबिकापुर पुलिस उसे दोबारा गिरफ्तार करने बिलासपुर पहुंची, तब मुकेश ने गिरफ्तारी से बचने के लिए सेनेटाइज़र पी लिया। उसकी हालत बिगड़ने पर उसे तुरंत सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी हालत गंभीर बनी हुई है।
प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत?
इस पूरे घटनाक्रम ने छत्तीसगढ़ की कानून व्यवस्था और जेल प्रबंधन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक ओर एक अपराधी आत्मसमर्पण करता है, दूसरी ओर उसे जेल में लेने की बजाय छोड़ दिया जाता है। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल प्रशासनिक चूक थी या फिर अंदरूनी मिलीभगत?
जांच की उठी मांग
इस मामले को लेकर अब राज्य स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एक आजीवन कारावास का दोषी कैदी आत्मसमर्पण करने के बाद भी घर पहुंच सकता है, तो यह पूरे सुरक्षा तंत्र के लिए खतरे की घंटी है। यह घटना बताती है कि आत्मसमर्पण करने वाले कैदियों के साथ प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया जा रहा।
मुकेश कांत का आत्मसमर्पण, पुलिस की लापरवाही और उसके बाद आत्महत्या का प्रयास, सब मिलकर छत्तीसगढ़ में कानून व्यवस्था की खस्ताहाली को उजागर करते हैं। यह मामला न केवल प्रशासनिक जवाबदेही का परीक्षण है, बल्कि यह भी बताता है कि सुधारात्मक प्रक्रियाओं में गंभीर बदलाव की आवश्यकता है।











