Bihar Assembly Election: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले एनडीए के भीतर सीट बंटवारे ने राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। नीतीश कुमार की जेडीयू और भाजपा के बीच पहली बार सीटों का बराबर बंटवारा हुआ है, जिससे जेडीयू के कद में गिरावट साफ नजर आ रही है। 2005 से लेकर 2020 तक जेडीयू हमेशा भाजपा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती रही, और बिहार में ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाती रही। लेकिन इस बार भाजपा ने बराबरी के साथ साथ गठबंधन में अपनी बढ़ती ताकत का परिचय दिया है।
बीजेपी के बिहार चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने जैसे ही 2025 के चुनावों के लिए सीट बंटवारे का ऐलान किया, राजनीतिक हलचल तेज हो गई। इस बार जेडीयू और भाजपा दोनों 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। इस आंकड़े का राजनीतिक महत्व बड़ा है क्योंकि इससे पहले कभी भाजपा ने जेडीयू को इस बराबरी का मौका नहीं दिया था। इससे स्पष्ट होता है कि अब बिहार में एनडीए का नेतृत्वकर्ता भाजपा ही है, जो गठबंधन के फैसले लेने में अग्रणी भूमिका निभा रही है।
2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू ने 138 सीटें लड़ी थीं जबकि भाजपा को 102 सीटें दी गई थीं। 2010 में जेडीयू की सीटें बढ़कर 141 और भाजपा की 102 रहीं। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू को 115 और भाजपा को 110 सीटें मिली थीं। यह पिछले 20 वर्षों में जेडीयू के कद में गिरावट को दर्शाता है, जो अब और स्पष्ट हो गई है।
विशेष रूप से, 2025 में सीटों के इस बराबरी के बंटवारे ने नीतीश कुमार की राजनीतिक शक्ति और प्रभाव में कमी का संकेत दिया है। उन्हें अब ‘बड़े भाई’ की भूमिका में नहीं देखा जा रहा, बल्कि भाजपा के प्रभुत्व को स्वीकार करना पड़ रहा है।
भाजपा ने न सिर्फ सीटों में बराबरी हासिल की है, बल्कि एनडीए में निर्णायक भूमिका भी अपने हाथ में ले ली है। सीट बंटवारे के बाद, भाजपा गठबंधन के अन्य सहयोगियों को भी नियंत्रित कर रही है। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को 29 सीटें मिली हैं, वहीं जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को 6-6 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। इस तरह भाजपा का प्रभुत्व स्पष्ट होता है, जो गठबंधन के रणनीतिक फैसलों पर निर्णायक होता जा रहा है।
नीतीश कुमार को पीएम मटेरियल के रूप में देखा जाता था, लेकिन इस बार की सीट बंटवारे ने उनकी स्थिति को चुनौती दी है। भाजपा की शर्तों पर गठबंधन में शामिल होकर जेडीयू को अपनी भूमिका पुनः परिभाषित करनी पड़ रही है। अब सवाल उठता है कि क्या एनडीए सरकार बनने पर नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बन पाएंगे या भाजपा अपनी प्रमुख भूमिका के दम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा जमाएगी?
2025 बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए के अंदर सीट बंटवारे ने बिहार की राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव ला दिया है। भाजपा का बढ़ता दबदबा और जेडीयू का घटता कद साफ संकेत देते हैं कि अब बिहार में सत्ता की बागडोर भाजपा के हाथ में है। नीतीश कुमार की ‘बड़े भाई’ वाली छवि कमजोर पड़ गई है, और अब भाजपा गठबंधन की दिशा और निर्णयों में मुख्य भूमिका निभा रही है। आने वाले चुनाव बिहार की राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत हो सकता है, जहां भाजपा ही एनडीए के नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरेगी।
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