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Trump Nobel Peace Prize : नॉबेल का सपना अधूरा! ट्रम्प पर नॉबेल कमेटी की दो टूक, ‘दबाव डालने से कुछ नहीं होगा’

Trump Nobel Peace Prize : अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नज़र इस बार नोबेल शांति पुरस्कार पर है, लेकिन उनकी यह महत्वाकांक्षा फिलहाल सपने जैसी ही लग रही है। ट्रम्प और उनके समर्थकों द्वारा लगातार नोबेल कमेटी पर दबाव बनाने की कोशिशों के बीच कमेटी ने अब स्पष्ट और सख्त रुख अपना लिया है। नोबेल कमेटी ने कहा है कि, “हम स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं, बाहरी दबावों का कोई असर नहीं होता।”

ट्रम्प का दावा – “मैंने 7 युद्ध रोके हैं”

डोनाल्ड ट्रम्प ने खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार बताते हुए कहा है कि उन्होंने कम से कम सात युद्धों को रोका है, और वह रूस-यूक्रेन और इज़राइल-हमास जैसे जटिल संघर्षों को भी समाप्त करने की कोशिशों में लगे हैं। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का उदाहरण देते हुए कहा कि ओबामा को बिना किसी विशेष उपलब्धि के शांति पुरस्कार मिल गया, फिर उन्हें क्यों नहीं?

नोबेल कमेटी ने दिया करारा जवाब

नोबेल समिति के सचिव क्रिस्टियन बर्ग हार्पविकेन ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बात करते हुए ट्रम्प की ओर से बनाए जा रहे दबाव पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा “मीडिया में किसी भी एक व्यक्ति को लेकर चर्चाएं होती हैं, लेकिन इससे हमारे निर्णय प्रभावित नहीं होते। हम सभी नामांकनों को जांचने के बाद स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं। हमारे ऊपर किसी भी प्रकार का राजनीतिक या बाहरी दबाव नहीं होता।”

नेतन्याहू, शरीफ और अलियेव ने की सिफारिश

हालांकि ट्रम्प की कोशिशें यहीं नहीं रुकीं। सूत्रों के मुताबिक, नोबेल पुरस्कार के लिए उनके पक्ष में इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ, पाक सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर, और अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलियेव ने सीधे सिफारिशें की हैं। जुलाई में नेतन्याहू ने तो लिखित प्रस्ताव भी कमेटी को भेजा था।

भारत ने किया ट्रम्प को नजरअंदाज

वहीं ट्रम्प ने भारत से भी समर्थन की उम्मीद जताई थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। यहां तक कि ट्रम्प द्वारा कई बार फोन करने के बावजूद मोदी ने फोन तक रिसीव नहीं किया, जिससे स्पष्ट हो गया कि भारत इस सिफारिशी खेल में शामिल नहीं होना चाहता।

नोबेल की दौड़ से बाहर ट्रम्प?

गौर करने वाली बात यह है कि नोबेल पुरस्कार के नामांकन की अंतिम तिथि 31 जनवरी थी, जबकि ट्रम्प सत्ता में 11 फरवरी को लौटे। ऐसे में उनका नाम यदि शामिल किया भी गया हो, तो वह 2026 के लिए मान्य होगा, 2025 के लिए नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमों और समयसीमा के चलते ट्रम्प का इस वर्ष नोबेल शांति पुरस्कार जीतना लगभग असंभव है।

डोनाल्ड ट्रम्प की नॉबेल की महत्वाकांक्षा और उसके लिए चलाई जा रही राजनीतिक लॉबिंग फिलहाल बेकार जाती दिख रही है। नोबेल कमेटी ने साफ कर दिया है कि वह न दबाव में आती है, न प्रचार से प्रभावित होती है। ऐसे में ट्रम्प को कम से कम इस साल नॉबेल शांति पुरस्कार का सपना छोड़ देना चाहिए।

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