North Indian Diet: द जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ इंडिया और चंडीगढ़ स्थित पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च के शोधकर्ताओं ने उत्तर भारत के लोगों की खानपान संबंधी आदतों का अध्ययन किया। शोध में खासतौर पर सोडियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और प्रोटीन के सेवन का आकलन किया गया, क्योंकि इन पोषक तत्वों का संतुलन रक्तचाप, हृदय और किडनी की सेहत से जुड़ा माना जाता है। अध्ययन में 400 से अधिक वयस्क शामिल हुए, जिनमें स्वस्थ लोगों के साथ शुरुआती चरण के क्रॉनिक किडनी डिजीज वाले प्रतिभागी भी थे। इसके निष्कर्ष Frontiers in Nutrition में प्रकाशित हुए हैं।
24 घंटे के यूरिन टेस्ट से जुटाई जानकारी
शोधकर्ताओं ने पोषक तत्वों के सेवन का अनुमान लगाने के लिए 24 घंटे के मूत्र उत्सर्जन विश्लेषण का इस्तेमाल किया। इस पद्धति को सामान्य डाइट संबंधी सवाल-जवाब की तुलना में अधिक विश्वसनीय माना जाता है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को पूरे दिन खाए गए भोजन को याद करके बताने की जरूरत कम होती है। भोजन की मात्रा या पुरानी डाइट को याद करने में होने वाली गलतियों का असर भी इससे घट सकता है। शोधकर्ताओं ने मूत्र के नमूनों में पोषक तत्वों के उत्सर्जन का विश्लेषण कर सेवन की बेहतर तस्वीर हासिल करने का प्रयास किया।
ज्यादा सोडियम और कम पोटैशियम ने बढ़ाई चिंता
अध्ययन में सबसे प्रमुख चिंता अत्यधिक नमक यानी सोडियम के सेवन और पोटैशियम की कम मात्रा को लेकर सामने आई। लंबे समय तक ज्यादा सोडियम का सेवन उच्च रक्तचाप के जोखिम को बढ़ा सकता है। वहीं, पर्याप्त पोटैशियम रक्तचाप और हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार दोनों के बीच असंतुलन हृदय रोग और लंबे समय तक रहने वाली किडनी की बीमारी के जोखिम से जुड़ा हो सकता है। इसके अलावा प्रतिभागियों में प्रोटीन का सेवन भी अनुशंसित मात्रा से कम पाया गया।
पुरुषों और महिलाओं के सेवन में दिखा अंतर
शोध में पुरुष प्रतिभागियों का कुल पोषक तत्व सेवन महिलाओं की तुलना में अधिक पाया गया। यह अंतर इस बात की ओर भी संकेत करता है कि अलग-अलग सामाजिक और जनसांख्यिकीय समूहों के लिए पोषण संबंधी रणनीति एक जैसी नहीं होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि खानपान से जुड़े हस्तक्षेप तैयार करते समय स्थानीय परिस्थितियों और लोगों की वास्तविक आहार आदतों को ध्यान में रखना जरूरी है।
गलत खानपान से बढ़ सकता गैर-संचारी बीमारियों का खतरा
भारत में गैर-संचारी बीमारियां तेजी से सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन रही हैं। हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और क्रॉनिक किडनी डिजीज जैसी समस्याओं के पीछे खानपान, शारीरिक गतिविधि, जीवनशैली और अन्य कारणों की संयुक्त भूमिका हो सकती है। अध्ययन के प्रमुख लेखक प्रोफेसर विवेकानंद झा ने बताया कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में भोजन की आदतें काफी भिन्न हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि किसी क्षेत्र के लोग वास्तव में कौन-से पोषक तत्व कितनी मात्रा में ले रहे हैं।
स्थानीय जरूरत के अनुसार बनें पोषण संबंधी गाइडलाइन
शोधकर्ताओं ने जोर दिया कि पूरे देश के लिए एक जैसी आहार संबंधी सलाह पर्याप्त नहीं हो सकती। भारत के अलग-अलग हिस्सों में भोजन की परंपरा, उपलब्ध खाद्य पदार्थ और खाने की आदतें अलग हैं। इसलिए स्थानीय जरूरतों के अनुरूप पोषण दिशानिर्देश तैयार करने की जरूरत है। लोगों को संतुलित और विविध आहार के लिए प्रोत्साहित करने के साथ नमक की मात्रा कम करने और पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करने पर जोर दिया जा सकता है।
खाद्य लेबल को स्पष्ट बनाने की जरूरत
विशेषज्ञों के अनुसार गैर-संचारी बीमारियों का जोखिम घटाने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा। खाद्य पदार्थों के लेबल को अधिक स्पष्ट बनाया जाना चाहिए, ताकि उपभोक्ता आसानी से नमक और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा समझ सकें। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में सोडियम की मात्रा कम करना भी महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इसके साथ फल और सब्जियों जैसे पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन को बढ़ावा देने की जरूरत है।
सटीक आंकड़ों से तैयार होगी बेहतर स्वास्थ्य नीति
अध्ययन का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि प्रभावी पोषण नीति के लिए लोगों के वास्तविक आहार सेवन का सटीक आकलन जरूरी है। केवल खानपान के बारे में पूछने से हमेशा पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि किस समुदाय में कौन-सा पोषक तत्व अधिक या कम लिया जा रहा है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, उत्तर भारत में सामने आए निष्कर्ष स्थानीय स्तर पर लक्षित स्वास्थ्य कार्यक्रमों की आवश्यकता बताते हैं। अध्ययन को विभिन्न सरकारी और शोध संस्थानों से वित्तीय सहयोग मिला था।
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