Odisha Discovery
Odisha Discovery: ओडिशा के संबलपुर जिले में स्थित रेडाखोल की भीममंडली पहाड़ियों के नीचे एक नई और अत्यंत प्राचीन सभ्यता के दबे होने की संभावना ने वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को उत्साहित कर दिया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने इस स्थल पर खुदाई का औपचारिक काम शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का प्रारंभिक अनुमान है कि यह सभ्यता लगभग 10,000 साल पुरानी हो सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह खोज भारत के इतिहास को एक नया मोड़ देगी। शुरुआती जांच के दौरान यहाँ पत्थर के सूक्ष्म ब्लेड, सुइयां और चमड़े के काम में उपयोग होने वाले औजार बरामद हुए हैं।
पुरातत्वविदों का मानना है कि भीममंडली में मिल रहे अवशेष विश्व प्रसिद्ध सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) से भी कहीं अधिक प्राचीन हो सकते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता का समय सामान्यतः 5,000 साल पुराना माना जाता है, जबकि यहाँ के साक्ष्य इसे पाषाण काल (Stone Age) के अंत और मध्य पाषाण काल की शुरुआत से जोड़ रहे हैं। यह खोज न केवल ओडिशा बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मानव विकास के क्रम को समझने में एक क्रांतिकारी कड़ी साबित हो सकती है।
इस स्थल की संवेदनशीलता को देखते हुए एएसआई के अधिकारी और कर्मचारी किसी भी प्रकार की भारी मशीनरी या आधुनिक उपकरणों का प्रयोग नहीं कर रहे हैं। खुदाई का काम पूरी तरह से हाथों से, छोटे औजारों और ब्रश की मदद से किया जा रहा है। सावधानी का स्तर इतना अधिक है कि पूरे दिन की मेहनत के बाद मिट्टी की केवल एक सेंटीमीटर की परत ही हटाई जाती है, ताकि हजारों साल पुराने अवशेषों को कोई नुकसान न पहुँचे।
पहाड़ियों के सर्वेक्षण के दौरान 45 से अधिक ऐसी गुफाएं मिली हैं जिनकी दीवारों पर शैलचित्र (Rock Paintings) बने हुए हैं। इन चित्रों में आदिमानव के जीवन, शिकार के दृश्यों और उनके दैनिक क्रियाकलापों को दर्शाया गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन चित्रों में आयरन ऑक्साइड और पेड़ों की छाल से बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया है। हजारों वर्षों के मौसमी बदलावों और वर्षा के बावजूद ये रंग आज भी स्पष्ट और चमकदार बने हुए हैं, जो उस समय के लोगों के वैज्ञानिक ज्ञान को दर्शाते हैं।
भीममंडली की इन पहाड़ियों को लेकर स्थानीय लोगों में गहरी धार्मिक आस्था है। वे इसे महाभारत काल से जोड़कर देखते हैं और मानते हैं कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ व्यतीत किया था। हालांकि, गंगाधर मेहर यूनिवर्सिटी और इनटैक (INTACH) के वैज्ञानिक साक्ष्य इसे स्पष्ट रूप से पाषाण काल की खोज मान रहे हैं। अब तक बरामद हुए पत्थर के तीर, चाकू और भाले के टुकड़े यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ एक कुशल शिकारी समाज निवास करता था, जो पत्थरों को तराश कर सटीक हथियार बनाने की कला में निपुण था।
जैसे-जैसे खुदाई से नई वस्तुएं बाहर आ रही हैं, उन्हें वैज्ञानिक विश्लेषण और ‘कार्बन डेटिंग’ के लिए प्रयोगशालाओं में भेजा जा रहा है। कार्बन डेटिंग की रिपोर्ट आने के बाद ही इस सभ्यता की सटीक आयु का आधिकारिक खुलासा हो सकेगा। इस बीच, स्थानीय निवासियों और भीममंडल संघ ने केंद्र सरकार से मांग की है कि इस स्थान के महत्व को देखते हुए इसे ‘राष्ट्रीय स्मारक’ घोषित किया जाए। पुरातत्वविदों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यहाँ से कुछ ऐसे खुलासे होंगे जो भारतीय इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को बदलने की क्षमता रखते हैं।
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