Oil LPG crisis India : खाड़ी देशों में जारी तनाव में कमी आने के बावजूद, ऊर्जा बाजार के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही भले ही दोबारा शुरू हो गई हो, लेकिन वहां जहाजों की भारी कमी के कारण परिवहन लागत (फ्रेट रेट) आसमान छू रही है। स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिण कोरियाई शिपिंग कंपनी ‘सिनोकोर’ द्वारा बुक किए गए एक विशाल तेल टैंकर का किराया सामान्य दर से लगभग 9 गुना अधिक तय किया गया है, जो इस वर्ष का सर्वाधिक है। यह रिकॉर्ड बुकिंग दर्शाती है कि समंदर में तनाव के बादल छंटने के बाद भी लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां यथावत बनी हुई हैं, जिसका सीधा असर तेल आयात पर पड़ रहा है।

किराए में बढ़ोतरी का गणित और तनाव का प्रभाव
तेल के जहाजों का किराया एक मानक (स्टैंडर्ड) दर पर आधारित होता है, लेकिन जहाजों की भारी किल्लत के कारण खरीदारों को वर्तमान में कई गुना अधिक भुगतान करना पड़ रहा है। इस संकट की जड़ मार्च 2026 में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़े टकराव में है, जिसने होर्मुज के समुद्री मार्ग से होने वाली 20 फीसदी वैश्विक तेल आपूर्ति को लगभग ठप कर दिया था। हालांकि, जून 2026 में अमेरिका-ईरान समझौते के बाद रास्ता खुल गया है, परंतु तनावपूर्ण महीनों के दौरान कई जहाज अन्य क्षेत्रों में चले गए थे। ओमान की खाड़ी में जहाजों की सीमित संख्या और बढ़ती मांग ने स्थिति को विक्रेता के पक्ष में मोड़ दिया है, जिससे कंपनियां मुंहमांगी कीमत चुकाने को मजबूर हैं।

भारत की रणनीतिक सतर्कता और रूसी तेल पर बढ़ती निर्भरता
इस अनिश्चित स्थिति में भारत सरकार अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है। राहत की बात यह है कि भारतीय नाविकों और कच्चे तेल से लदे कई जहाज सफलतापूर्वक इस खतरनाक मार्ग को पार कर चुके हैं। भारत ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए होर्मुज मार्ग पर निर्भरता कम करने के लिए रूस को अपना प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना लिया है। जून 2026 में भारत का रूसी तेल आयात 26 लाख बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है, जो भारत के कुल तेल आयात का 53.5 फीसदी है। इसके अतिरिक्त, आपूर्ति के अन्य विकल्पों के रूप में उत्तरी अमेरिका और वेनेजुएला से भी आयात बढ़ाया गया है ताकि किसी भी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।
आम आदमी की जेब पर असर: क्या पेट्रोल-डीजल होगा महंगा?
आम आदमी के लिए राहत की बात यह है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें (ब्रेंट क्रूड) गिरकर 73 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गई हैं। हालांकि, जहाजों की कमी के कारण आयात बिल पर पड़ने वाला दबाव अभी भी चिंता का विषय है। भारत की सरकारी तेल कंपनियां, जो संकट के चरम पर प्रतिदिन करोड़ों का नुकसान झेल रही थीं, फिलहाल स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रही हैं। यदि आने वाले कुछ हफ्तों में जहाजों की आपूर्ति सामान्य होती है, तो आयात बिल कम होगा और इससे रुपए को मजबूती मिलेगी, जिससे पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को थामने में मदद मिलेगी। फिलहाल, स्थिति सामान्य होने तक ऊर्जा क्षेत्र में सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।
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