West Bengal Politics
West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सुप्रीमो ममता बनर्जी की मुश्किलें लगातार बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। पार्टी के भीतर असंतोष और बिखराव की खबरें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। हाल ही में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और वरिष्ठ पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए हमलों के बाद, ममता ने स्थिति की समीक्षा और रणनीति बनाने के लिए पार्टी विधायकों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई थी। यह महत्वपूर्ण बैठक रविवार शाम 4 बजे ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित कालीघाट आवास पर शुरू हुई। लेकिन इस बैठक के नतीजों ने राजनीतिक गलियारों में तहलका मचा दिया, क्योंकि बैठक में विधायकों की उपस्थिति बेहद निराशाजनक रही।
हैरानी की बात यह रही कि ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई इस अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक में टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से केवल 20 विधायक ही कालीघाट पहुंचे। बैठक में पहुंचने वालों में ज्यादातर पार्टी के बेहद वरिष्ठ और वफादार चेहरे ही शामिल थे। अब राजनीतिक हलकों में यह सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है कि आखिर बाकी के 60 विधायक इस संकट की घड़ी में बैठक में क्यों शामिल नहीं हुए? इस अनुपस्थिति को लेकर राज्य की राजनीति में अलग-अलग तरह की अटकलें और कयास लगाए जाने शुरू हो गए हैं, जिसने टीएमसी खेमे में बेचैनी बढ़ा दी है।
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक विश्लेषक यह अंदेशा जता रहे हैं कि क्या तृणमूल कांग्रेस के भीतर कोई बहुत बड़ी फूट पड़ चुकी है? कयास तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि बैठक से दूरी बनाने वाले ये 60 विधायक कहीं न कहीं राज्य की मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी के साथ संपर्क में हैं और पाला बदलने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इस बेहद संवेदनशील विषय पर फिलहाल तृणमूल कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के किसी भी शीर्ष नेता की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इन बढ़ती अटकलों के बीच बेलेघाटा से विधायक कुणाल घोष ने ममता के घर के बाहर आकर पार्टी में सब कुछ ठीक होने का दावा किया।
रविवार शाम को जब कालीघाट आवास पर विधायकों की संख्या महज 20 पर ही आकर अटक गई, तो विवाद बढ़ता देख विधायक कुणाल घोष को पत्रकारों के सामने आकर मोर्चा संभालना पड़ा। बैठक में शामिल होने के लिए कुणाल घोष, शोभंदेव चटर्जी, मदन मित्रा, नयना बनर्जी, अशोक कुमार देब और बिमान बनर्जी जैसे नेता एक-एक करके पहुंचे थे। मीडिया के तीखे सवालों का जवाब देते हुए कुणाल घोष ने पार्टी की ‘एकता’ दिखाने की पुरजोर कोशिश की और दावा किया कि अधिकतर विधायक अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों में व्यस्त हैं, जिसके कारण बैठक की रूपरेखा बदलनी पड़ी।
कुणाल घोष ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, “बीते दिन तृणमूल के अखिल भारतीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी पर कायराना हमला हुआ था। इसके बाद आज सांसद कल्याण बनर्जी को भी निशाना बनाया गया। इन हिंसक घटनाओं के विरोध में तृणमूल के तमाम विधायक और कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान पुलिस ने हमारे कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है, जिन्हें थानों से छुड़ाने में स्थानीय विधायक व्यस्त हैं। इसी वजह से विधायकों ने फोन पर नेतृत्व से आज की बैठक को स्थगित करने का अनुरोध किया था। उनकी मांग को स्वीकार करते हुए मुख्य बैठक स्थगित कर दी गई और जो लोग यहां मौजूद थे, उन्होंने केवल एक आंतरिक चर्चा की है।”
टीएमसी नेतृत्व ने आगे की रणनीति का खुलासा करते हुए बताया कि इस हिंसा के खिलाफ पार्टी चुप नहीं बैठेगी। आगामी 1 जून को तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता राज्य के हर वार्ड और ब्लॉक स्तर पर विशाल विरोध मार्च निकालेंगे। इसके ठीक अगले दिन, यानी 2 जून को खुद ममता बनर्जी कोलकाता में एक दिवसीय धरने पर बैठेंगी। यह धरना न केवल अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के विरोध में होगा, बल्कि रानी रश्मोनी रोड से फेरीवालों को हटाए जाने के प्रशासनिक फैसले सहित विभिन्न जनहित के मुद्दों को लेकर आयोजित किया जाएगा। इसके जरिए पार्टी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी।
दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस के इस आंतरिक संकट पर विपक्ष ने तीखा तंज कसा है। मानिकतला विधानसभा सीट से भाजपा विधायक तापस रॉय ने ममता बनर्जी की बैठक रद्द होने और विधायकों की कम संख्या पर चुटकी लेते हुए कहा कि यह तृणमूल कांग्रेस के अंत की शुरुआत है। उन्होंने दावा किया कि टीएमसी के विधायकों ने अब अपनी ही सुप्रीमो ममता बनर्जी के नेतृत्व पर पूरी तरह से अविश्वास जता दिया है। विधायक अब समझ चुके हैं कि पार्टी का भविष्य अंधकार में है, इसलिए वे ममता के निर्देश मानने से कतरा रहे हैं। बहरहाल, बंगाल की राजनीति में शह-मात का यह खेल आने वाले दिनों में और दिलचस्प होने वाला है।
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