पशु-पक्षी

Vulture Conservation : गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम के सकारात्मक नतीजे, दो दशक बाद आसमान में फिर बढ़ी गिद्धों की मौजूदगी

Vulture Conservation : लगभग दो दशक पहले भारतीय आसमान से एक बेहद जरूरी पक्षी लगभग पूरी तरह गायब हो गया था। पशु-चिकित्सा में अंधाधुंध इस्तेमाल होने वाली कुछ अत्यंत विषैली दवाओं के कारण भारत में गिद्धों की आबादी विनाश के कगार पर पहुंच गई थी। प्रकृति के इस सबसे बड़े सफाईकर्मी की कमी से पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ने लगा था। हालांकि, अब संरक्षणवादियों और सरकार के अथक प्रयासों से एक सुखद खबर सामने आ रही है। देश में करीब 700 से अधिक गिद्धों को विशेष कैद (कंजर्वेशन सेंटर्स) में रखकर कराए गए सफल प्रजनन और फिर उन्हें चरणबद्ध तरीके से वापस खुले आसमान में छोड़ने के पुनर्वास कार्यक्रमों की बदौलत इन शानदार पक्षियों की धीरे-धीरे शानदार वापसी हो रही है।

इस समय भारत के संरक्षित बाघ अभयारण्य (टाइगर रिजर्व) इन विलुप्तप्राय जीवों के लिए नए और सबसे सुरक्षित आशियाने के रूप में उभर रहे हैं। ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी’ (BNHS) और विभिन्न राज्यों के वन विभागों के संयुक्त नेतृत्व में जारी अत्यंत संकटग्रस्त सफेद-पीठ वाले और लंबी-पतली चोंच वाले गिद्धों की पुनर्बहाली परियोजना अब एक बेहद ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।

चार राज्यों में चल रहा है गिद्धों को जंगल में छोड़ने का अनूठा प्रयोग

बीएनएचएस (BNHS) के वर्तमान निदेशक किशोर रिठे ने इस महापरियोजना को लेकर एक बड़ा और उत्साहजनक अपडेट साझा किया है। उन्होंने बताया कि इस समय देश के चार प्रमुख राज्यों- हरियाणा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और असम के घने जंगलों में प्रायोगिक रूप से इन पाले गए गिद्धों को खुले वातावरण में छोड़ा जा रहा है। आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इन सभी गिद्धों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उनके शरीर पर जीपीएस (GPS) और जीएसएम (GSM) ट्रांसमीटर लगाए गए हैं, जिसके परिणाम वैज्ञानिकों को काफी उत्साहित कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर, महाराष्ट्र के पेंच बाघ अभयारण्य से मुक्त किया गया लंबी चोंच वाला एक गिद्ध उड़ते हुए केवल 17 दिनों के भीतर करीब 750 किलोमीटर की लंबी हवाई यात्रा तय करके महाराष्ट्र के ही नासिक शहर पहुंच गया। हालांकि, निदेशक रिठे ने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरी परियोजना की दीर्घकालिक और वास्तविक सफलता इस बात पर टिकी होगी कि संरक्षित टाइगर रिजर्व वाले इलाकों से बाहर भी गिद्धों के लिए जहरीली दवाओं से मुक्त और पूरी तरह सुरक्षित भोजन के स्रोत निरंतर मिलते रहें।

डाइक्लोफेनाक दवा बनी थी गिद्धों की सामूहिक मौतों का असली कारण

गिद्धों की आबादी को दोबारा बढ़ाने के इस बेहद जटिल अभियान की सफलता तभी स्थायी हो पाएगी, जब देश के आम रिहायशी और ग्रामीण क्षेत्रों के बाहर भी इन पक्षियों के लिए एक भयमुक्त और जहरमुक्त माहौल तैयार किया जाए। इसके लिए हानिकारक दर्द निवारक दवाओं को पशु चिकित्सा से पूरी तरह से समाप्त करना और गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना सबसे ज्यादा अनिवार्य है। गौरतलब है कि बीएनएचएस ने साल 1999 में पहली बार भारतीय उपद्वीप में गिद्धों की संख्या में आई भयानक और चौंकाने वाली गिरावट को आधिकारिक रूप से दर्ज किया था।

इसके बाद किए गए कई वर्षों के गहन वैज्ञानिक शोध और मेडिकल रिसर्च में यह प्रामाणिक रूप से सिद्ध हुआ कि मवेशियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली ‘डाइक्लोफेनाक’ (Diclofenac) नामक एक गैर-स्टेरॉयडल सूजनरोधी दवा (NSAID) ही इन पक्षियों की सामूहिक और दर्दनाक मौतों की असली जिम्मेदार थी।

पशुओं के शवों के जरिए गिद्धों के शरीर में फैलता था धीमा जहर

दरअसल, ग्रामीण भारत में गाय, भैंस और अन्य पालतू मवेशियों के हर छोटे-बड़े दर्द और सूजन के इलाज में डाइक्लोफेनाक दवा का धड़ल्ले से उपयोग किया जाता था। जब इन उपचारित मवेशियों की किसी बीमारी या वृद्धावस्था के कारण मृत्यु हो जाती थी, तो उनके मृत शरीरों (शवों) के भीतर इस खतरनाक डाइक्लोफेनाक दवा के अंश बहुत दिनों तक मौजूद रहते थे। चूंकि गिद्ध प्राकृतिक रूप से केवल मृत जानवरों का मांस खाकर ही अपना पेट भरते हैं, इसलिए जैसे ही वे इन शवों को खाते थे, यह विषैली दवा सीधे उनके शरीर के भीतर चली जाती थी।

यह दवा गिद्धों की किडनी को पूरी तरह फेल कर देती थी, जिससे कुछ ही दिनों में उनकी मौत हो जाती थी। इस बड़ी वैज्ञानिक खोज के बाद केंद्र सरकार ने गंभीरता दिखाते हुए साल 2006 में इस दवा के पशु-चिकित्सा उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद के सालों में इसी तरह की अन्य घातक दवाओं जैसे केटोप्रोफेन, एसेक्लोफेनाक और निमेसुलाइड पर भी कड़ा प्रतिबंध लगाया गया।

जटायु संरक्षण केंद्रों से मिली नई जिंदगी, पड़ोसी देशों तक फैली उड़ान

गिद्धों की प्रजातियों को पूरी दुनिया से हमेशा के लिए लुप्त होने से बचाने के लिए बीएनएचएस और विभिन्न राज्यों के वन विभागों ने अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स’ (RSPB) के साथ मिलकर देश में चार बड़े आधुनिक ‘जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र’ स्थापित किए। ये केंद्र पिंजौर (हरियाणा), राजाभातखावा (पश्चिम बंगाल), रानी (असम) और भोपाल (मध्य प्रदेश) में सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। वर्तमान में इन अत्यधिक सुरक्षित केंद्रों में करीब 740 गिद्धों की बेहद वैज्ञानिक तरीके से देखभाल की जा रही है। इस विशेष कार्यक्रम के तहत अब तक विभिन्न रिसर्च सेंटर्स को 80 गिद्ध उपलब्ध कराए जा चुके हैं और लगभग 110 पूरी तरह से स्वस्थ गिद्धों को खुले जंगलों में आज़ाद किया जा चुका है।

इस पुनर्स्थापन कार्यक्रम के जरिए अब तक कई चमत्कारी और ऐतिहासिक सफलताएं देखने को मिली हैं:

  • प्राकृतिक प्रजनन की शुरुआत: वर्ष 2020 के दौरान हरियाणा के जंगलों में छोड़े गए सफेद-पीठ वाले गिद्धों ने अब पिंजरों से बाहर खुले आसमान के नीचे प्राकृतिक रूप से घोंसले बनाकर अंडे देना और सफलतापूर्वक प्रजनन करना शुरू कर दिया है।

  • अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार किया: पश्चिम बंगाल के जंगलों से छोड़े गए 31 गिद्धों का एक बड़ा दल पूरी तरह सुरक्षित तरीके से उड़ान भरते हुए अब भारत की सीमाओं को लांघकर पड़ोसी देशों नेपाल और भूटान के पहाड़ी इलाकों तक फैल चुका है।

  • दवाओं से कोई मौत नहीं: सबसे बड़ी राहत और खुशी की बात यह है कि अब तक छोड़े गए इन सभी गिद्धों में से एक की भी मौत पशु-चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली किसी भी हानिकारक दवा की वजह से नहीं हुई है, जो इस प्रोजेक्ट की बहुत बड़ी जीत है।

  • महाराष्ट्र बना मुख्य हब: इस समय महाराष्ट्र राज्य गिद्धों की पुनर्बहाली और उनके सफल पुनर्वास का एक सबसे बड़ा राष्ट्रीय केंद्र बनकर उभरा है, जहां के वन्यजीव विशेषज्ञ बेहतरीन काम कर रहे हैं।

  • अभ्यारण्यों में सुरक्षित विमोचन: महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पेंच, ताडोबा-अंधारी और मेलघाट बाघ अभयारण्यों के घने कोर एरिया में इन प्रजनन केंद्रों से लाए गए युवा गिद्धों को लगातार प्रकृति के बीच स्वतंत्र किया जा रहा है।

बाघ अभयारण्य क्यों साबित हो रहे हैं गिद्धों के लिए सबसे बेहतरीन आशियाना?

हाल के कुछ वर्षों में वन्यजीव विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का ध्यान पूरी तरह से देश के इन सुरक्षित बाघ अभयारण्यों (टाइगर रिजर्व) पर जाकर केंद्रित हुआ है। इसके पीछे कई बेहद महत्वपूर्ण भौगोलिक और पारिस्थितिक कारण हैं। वास्तव में, इन बाघ अभयारण्यों के भीतर बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के हजारों वर्ग किलोमीटर का एक विशाल और अबाध प्राकृतिक वन क्षेत्र उपलब्ध होता है। इसके अलावा, इन जंगलों के भीतर इंसानी बस्तियां न होने के कारण पालतू मवेशी नहीं आते, जिससे इंसानी दवाओं से पूरी तरह मुक्त मृत जंगली जानवर प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

संरक्षण विशेषज्ञों के मुताबिक, बाघ अभयारण्य गिद्धों को छोड़ने के लिए हर मायने में सबसे आदर्श और अनुकूल स्थान साबित हुए हैं क्योंकि यहां इंसानी बस्तियों से दूर होने के कारण हानिकारक पशु-चिकित्सा दवाओं का कोई नामोनिशान नहीं होता। इसके साथ ही, यहाँ चीतल, सांभर, नीलगाय और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी हिरणों के शव गिद्धों के लिए सालों भर शुद्ध और प्रचुर भोजन का एक सबसे सुरक्षित प्राकृतिक स्रोत बने रहते हैं।

हालिया वैज्ञानिक सर्वे से मिले आबादी में सुधार के बेहद सकारात्मक संकेत

बीएनएचएस द्वारा हाल ही में देश के विभिन्न जंगलों में किए गए व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और डेटा के विश्लेषण से यह साफ संकेत मिला है कि कई प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों और बाघ अभयारण्यों में गिद्धों की संख्या में अब धीरे-धीरे बढ़ोतरी होने लगी है। यह सकारात्मक बदलाव इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि पिछले कई दशकों से गिद्धों की आबादी में जारी लगातार गिरावट को अब सरकारी और सामाजिक प्रयासों के जरिए सफलतापूर्वक रोका और पलटा जाने लगा है।

प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने वाला यह ऐतिहासिक कार्यक्रम केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA), विभिन्न राज्यों के वन विभागों तथा कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित संरक्षण संगठनों के आपसी तालमेल और सामूहिक सहयोग से पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन रहा है।

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