Orangutan Trafficking : ओरंगउटान की अवैध तस्करी लंबे समय से दक्षिण-पूर्व एशिया में वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। इंडोनेशिया और मलेशिया में ओरंगउटान को रखना और उनका व्यापार करना गैरकानूनी है, इसके बावजूद इनके अवैध कारोबार की खबरें सामने आती रहती हैं। हाल ही में ओडिशा के बालासोर जिले के एक जंगल से वन विभाग ने गंभीर रूप से संकटग्रस्त माने जाने वाले ओरंगउटान के पांच बच्चों को बचाया है।
इंडोनेशिया से तस्करी का जताया जा रहा शक
वन विभाग की कार्रवाई के बाद आशंका जताई जा रही है कि ये ओरंगउटान अवैध तस्करी के जरिए इंडोनेशिया से भारत पहुंचे होंगे। चूंकि ओरंगउटान स्वाभाविक रूप से भारत में नहीं पाए जाते, इसलिए इनके यहां मिलने से अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी की आशंका गहरी हुई है। सभी बचाए गए बच्चे दो साल से कम उम्र के बताए जा रहे हैं और फिलहाल भुवनेश्वर के पास नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क में रखे गए हैं।
जंगलों की कटाई से बढ़ रहा खतरा
ओरंगउटान की तस्करी का एक बड़ा कारण उनके प्राकृतिक आवास का लगातार नष्ट होना माना जाता है। जंगलों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण इन जानवरों के रहने और भोजन तलाशने के क्षेत्र कम होते जा रहे हैं। ऐसे में कई ओरंगउटान जमीन पर आने को मजबूर होते हैं, जहां उनका सामना इंसानों से होता है और वे शिकार या तस्करी का शिकार बन सकते हैं।
बच्चों की होती है अवैध बाजार में मांग
वन्यजीव तस्करी में ओरंगउटान के बच्चों की मांग विशेष रूप से बताई जाती है। संरक्षण संगठनों के अनुसार, शिकारियों द्वारा वयस्क मादा ओरंगउटान को मारकर उसके बच्चे को पकड़ने की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसके बाद बच्चों को पालतू जानवरों के रूप में बेचने या दूसरे अवैध वन्यजीव कारोबार में भेजने की कोशिश की जाती है।
तस्करी के दौरान कई बच्चों की मौत
पकड़े गए ओरंगउटान बच्चों के लिए अवैध व्यापार की पूरी प्रक्रिया बेहद खतरनाक होती है। लंबी दूरी की तस्करी, खराब देखभाल, बीमारी, चोट और मां से अलग होने के सदमे के कारण कई बच्चे जीवित नहीं बच पाते। उपलब्ध संरक्षण अध्ययनों में यह भी अनुमान लगाया गया है कि एक ओरंगउटान के बचने के दौरान कई अन्य बच्चों की मौत हो सकती है।
ओरंगउटान का इस्तेमाल कई उद्देश्यों के लिए
ओरंगउटान का अवैध कारोबार केवल पालतू जानवरों के बाजार तक सीमित नहीं है। इनके व्यापार के पीछे पालतू जानवर के रूप में रखने, भोजन, पारंपरिक दवाओं, बायोमेडिकल रिसर्च, चिड़ियाघरों और निजी वन्यजीव संग्रह जैसे अलग-अलग उद्देश्य बताए जाते हैं। मनोरंजन उद्योग से जुड़े अवैध कारोबार में भी इनका इस्तेमाल होने की जानकारी सामने आती रही है।
इंसानों से काफी मिलता है DNA
ओरंगउटान और इंसानों के बीच आनुवंशिक समानता भी वैज्ञानिक और आम लोगों की रुचि का कारण रही है। इनके DNA का करीब 97 प्रतिशत हिस्सा इंसानों से मिलता-जुलता बताया जाता है। ये अत्यधिक बुद्धिमान जानवर हैं और इंसानी गतिविधियों को सीखने तथा समझने की क्षमता रखते हैं। उनकी बच्चों जैसी गतिविधियां भी उन्हें अवैध पालतू बाजार में आकर्षक बनाती हैं।
मां को मारकर बच्चे पकड़ने का दावा
2005 के एक शोध का हवाला देते हुए बताया गया है कि ओरंगउटान के बच्चे को पकड़ने के लिए अक्सर उसकी मां को मार दिया जाता है। बच्चा मां से अलग होने के बाद तस्करों के कब्जे में चला जाता है और उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस बाजार में बेचा जाना है। यह प्रक्रिया प्रजाति के संरक्षण के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है।
जंगल में लौटाना संरक्षण की प्राथमिकता
प्राइमेटोलॉजिस्ट जी अगोरामुर्थी के अनुसार, विदेशी पालतू जानवरों और चिड़ियाघर के कारोबार के लिए ओरंगउटान की अवैध तस्करी उनकी जंगली आबादी के लिए खतरा है। उनके मुताबिक, मूल आवास से बाहर बचाए या जब्त किए गए ओरंगउटान बच्चों को जल्द से जल्द उपयुक्त संरक्षण व्यवस्था के जरिए उनके प्राकृतिक क्षेत्र में वापस भेजने की कोशिश होनी चाहिए।
तीन जीवित प्रजातियां मौजूद
ओरंगउटान दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में पाए जाने वाले ग्रेट एप्स हैं। वर्तमान में बोर्नियन, सुमात्रन और तपानुली ओरंगउटान की तीन जीवित प्रजातियां मानी जाती हैं। ये आम तौर पर अकेले रहना पसंद करते हैं और पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर भोजन व आवास तलाशते हैं। जंगलों का नष्ट होना और अवैध तस्करी इनके अस्तित्व के सामने गंभीर चुनौतियां हैं।
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