Parshuram story
Parshuram story: हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु ने समय-समय पर अधर्म का नाश करने के लिए विभिन्न अवतार लिए हैं। इन्हीं में से छठवां अवतार भगवान परशुराम का है। परशुराम जी के बारे में यह मान्यता है कि वे ‘सप्त चिरंजीवियों’ में से एक हैं और आज भी पृथ्वी पर सशरीर वास कर रहे हैं। उनके जन्म का नाम केवल ‘राम’ था, लेकिन उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर जब महादेव ने उन्हें अपना दिव्य अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) भेंट किया, तब से वे परशुराम कहलाए। वे महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका की संतान थे। हालांकि उनका जन्म एक ब्राह्मण कुल में हुआ था, लेकिन उनके कर्म और स्वभाव सदैव एक तेजस्वी क्षत्रिय के समान रहे।
भगवान परशुराम की माता रेणुका का पतिव्रत धर्म अत्यंत प्रभावशाली था। लोककथाओं के अनुसार, वे अपने तपोबल से कच्ची मिट्टी के घड़े में नदी से जल भरकर लाती थीं और उस कच्चे घड़े से पानी की एक बूंद भी नहीं गिरती थी। एक दिन जब वे नदी तट पर जल लेने गईं, तो वहां उनकी दृष्टि ‘चित्रांगद’ नामक गंधर्व पर पड़ी, जो अपनी अप्सराओं के साथ विहार कर रहा था। उस वैभव और विलास को देखकर माता रेणुका का मन क्षण भर के लिए विचलित हो गया। मन की इस चंचलता के कारण उनका पतिव्रत धर्म खंडित हो गया और परिणाम स्वरूप उस दिन कच्ची मिट्टी के घड़े में जल नहीं ठहर पाया।
जब माता रेणुका खाली हाथ और अश्रुपूरित आंखों के साथ आश्रम लौटीं, तो महर्षि जमदग्नि ने अपने योग बल से समस्त घटनाक्रम को जान लिया। अपनी पत्नी के मानसिक विचलन को देखकर वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने बारी-बारी से अपने चार बड़े पुत्रों को बुलाया और उन्हें माता का वध करने की आज्ञा दी। लेकिन मातृ-प्रेम के वशीभूत होकर चारों बेटों ने पिता की इस कठोर आज्ञा को मानने से इनकार कर दिया। पुत्रों की इस अवज्ञा से क्रोधित होकर महर्षि ने अपने ही चारों पुत्रों को चेतनाहीन और विवेकहीन हो जाने का श्राप दे दिया।
अंत में महर्षि ने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को आदेश दिया। परशुराम जी ने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए बिना किसी विलंब के अपनी माता का सिर काट दिया। पुत्र के इस कठिन पितृ-भक्ति भाव को देखकर महर्षि जमदग्नि का क्रोध शांत हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर परशुराम से वर मांगने को कहा। परशुराम जी ने चतुराई और भक्ति का परिचय देते हुए तीन वरदान मांगे: पहला—माता पुनः जीवित हो जाएं; दूसरा—उन्हें अपने वध की कोई स्मृति न रहे; और तीसरा—उनके चारों भाइयों की चेतना वापस लौट आए। महर्षि ने ‘तथास्तु’ कहकर तीनों इच्छाएं पूरी कर दीं।
पौराणिक मान्यताओं में एक दिलचस्प कड़ी यह भी है कि माता रेणुका को अपने वध का स्मरण था। उन्होंने पुत्र से कहा था कि जिस प्रकार तुमने मुझे कष्ट दिया, भविष्य में तुम्हें भी वियोग सहना होगा। कहा जाता है कि त्रेता युग में माता रेणुका ही राजा दशरथ की पत्नी ‘कैकेयी’ के रूप में जन्मी थीं। उन्होंने ही विष्णु जी के सातवें अवतार भगवान श्री राम के लिए वनवास मांगा था, जिसके कारण परशुराम के आराध्य श्री राम को कष्ट सहना पड़ा। यह कथा हमें सिखाती है कि कर्मों का चक्र अत्यंत सूक्ष्म और अनिवार्य होता है।
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