Potato Blight
Potato Late Blight Bihar: बिहार के मैदानी इलाकों में कड़ाके की ठंड और बढ़ते कोहरे के बीच किसानों की चिंता बढ़ गई है। जहाँ एक ओर किसान गेहूं की बुवाई और सिंचाई में व्यस्त हैं, वहीं आलू की फसल पर ‘झुलसा रोग’ (Blight Disease) का खतरा मंडराने लगा है। मौसम में नमी और तापमान में गिरावट के कारण यह रोग तेजी से फैलता है, जिससे आलू की पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बिहार कृषि विभाग ने विस्तृत दिशा-निर्देश और एडवाइजरी जारी की है, ताकि समय रहते किसान अपनी मेहनत की कमाई को बचा सकें।
कृषि विशेषज्ञों ने आलू में लगने वाले झुलसा रोग को इसकी संक्रामकता के कारण “चक्रवृद्धि ब्याज रोग” की संज्ञा दी है। यह एक फफूंद (Fungus) जनित विनाशकारी बीमारी है। विशेष रूप से ‘पिछात झुलसा’ (Late Blight) का संक्रमण इतनी तीव्र गति से होता है कि यदि समय पर ध्यान न दिया जाए, तो देखते ही देखते पूरी की पूरी फसल जलकर राख जैसी दिखाई देने लगती है। यह रोग अनुकूल मौसम मिलने पर कुछ ही दिनों के भीतर पूरे खेत को अपनी चपेट में ले लेता है, जिससे कंदों का विकास रुक जाता है और पैदावार में भारी गिरावट आती है।
किसानों के लिए यह जानना आवश्यक है कि आलू की फसल में झुलसा रोग मुख्य रूप से दो श्रेणियों में आता है:
अगात झुलसा (Early Blight): इसमें पत्तियों पर भूरे रंग के छोटे, छल्लेनुमा गोल धब्बे दिखाई देते हैं। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, पत्तियां झुलसकर गिर जाती हैं।
पिछात झुलसा (Late Blight): यह अधिक खतरनाक है। इसमें पत्तियों के किनारे और ऊपरी सिरे सूखने लगते हैं। यदि सूखे हुए भाग को हाथ से रगड़ा जाए, तो ‘खर-खर’ की आवाज आती है। कोहरे वाले मौसम में इसका प्रकोप सबसे अधिक होता है।
कृषि विभाग की सलाह के अनुसार, बचाव का सबसे पहला कदम सावधानी है। किसानों को अपने खेतों को पूरी तरह साफ-सुथरा रखना चाहिए और खरपतवार को समय-समय पर हटाना चाहिए। बुवाई के समय हमेशा स्वस्थ और रोगमुक्त बीजों का ही चयन करना चाहिए। यदि आसपास के खेतों में रोग के लक्षण दिखाई दें, तो एहतियात के तौर पर 15 दिनों के अंतराल पर ‘मैनकोज़ेब 75% WP’ का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। यह सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।
आरपीसीएयू (RPCAU) पूसा के प्लांट पैथोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, यदि खेत में रोग के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखने लगें, तो तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है। किसान ‘मैनकोज़ेब 75% WP’, ‘कार्बेन्डाज़िम 12% + मैनकोज़ेब 63% WP’ या ‘कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP’ में से किसी एक ही फफूंदनाशी का प्रयोग करें। छिड़काव के लिए 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की मात्रा निर्धारित है। दवाओं के सटीक मिश्रण से न केवल रोग की गंभीरता कम होती है, बल्कि आलू के कंदों की उपज भी सुरक्षित रहती है।
विशेष रूप से ‘पिछात झुलसा’ के प्रभावी नियंत्रण के लिए, विशेषज्ञ ‘मेटालैक्सिल-एम 4%’ और ‘मैनकोज़ेब 64% WP’ के मिश्रण को सबसे कारगर मानते हैं। इसे भी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि सही तकनीक और सही समय पर किया गया छिड़काव किसानों को आर्थिक नुकसान से बचा सकता है। इसके साथ ही, ओस के समय छिड़काव से बचना चाहिए और जब धूप खिली हो तभी दवाओं का प्रयोग करना बेहतर परिणाम देता है।
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