Mango Farming
Mango Farming: उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाकों में आम केवल एक स्वादिष्ट फल नहीं है, बल्कि यह लाखों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का मुख्य स्रोत और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। मार्च का महीना इन बागवानों के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है, क्योंकि इसी अवधि में पेड़ों पर ‘बौर’ (फूल) आते हैं और धीरे-धीरे ‘टिकोले’ बनने की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू होती है। इस साल दोनों राज्यों के बागों में बौर की स्थिति काफी उत्साहजनक देखी जा रही थी, जिससे बंपर पैदावार की उम्मीद जगी थी। हालांकि, प्रकृति के बदलते मिजाज ने किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। मार्च में अचानक हो रही बारिश, आसमान में बादलों का डेरा और वातावरण में बढ़ती नमी ने इस सुनहरे भविष्य पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं।
आम की फसल वर्तमान में अपनी सबसे संवेदनशील अवस्था से गुजर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय होने वाली बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि न केवल बौर को झुलसा सकती है, बल्कि परागण (Pollination) की प्राकृतिक प्रक्रिया को भी बुरी तरह बाधित कर सकती है। यदि बौर झड़ गए या उनमें संक्रमण फैल गया, तो फल बनने की संभावना न्यूनतम हो जाएगी। इससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ सकती है, जिससे बागवानी क्षेत्र में निवेश करने वाले छोटे और मंझले किसानों की कमर टूट सकती है। इस नाजुक समय में बरती गई थोड़ी सी भी लापरवाही साल भर की मेहनत को मिट्टी में मिला सकती है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार) के पौध रोग विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, मौसम में आए इस बदलाव और तापमान के उतार-चढ़ाव के कारण बौर पर ‘झुलसा रोग’ (Blossom Blight) लगने की आशंका काफी बढ़ गई है। डॉ. सिंह का कहना है कि यदि वातावरण में आर्द्रता (नमी) 80 प्रतिशत से अधिक हो जाए, तो यह रोग तेजी से फैलता है और पूरा बौर सूख कर काला पड़ जाता है। इससे बचाव के लिए किसानों को मेन्कोजेब + कार्बेन्डाजिम (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) या ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन + टेबुकोनाजोल (0.25 ग्राम प्रति लीटर पानी) का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। यह कार्य सुबह या शाम के समय करना अधिक प्रभावशाली रहता है।
आम की फसल का दूसरा सबसे घातक दुश्मन ‘खर्रा रोग’ है, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में ‘दहिया’ भी कहा जाता है। इस रोग में बौर और नन्हे फलों पर सफेद पाउडर जैसा फफूंद जमा हो जाता है, जिससे फल विकसित होने से पहले ही गिर जाते हैं। यह रोग तब ज्यादा सक्रिय होता है जब तापमान 18 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहे। इसके सफल प्रबंधन के लिए डॉ. सिंह घुलनशील सल्फर (2 ग्राम प्रति लीटर) या हेक्साकोनाजोल (1 मिली प्रति लीटर) के छिड़काव की सलाह देते हैं। किसानों को चाहिए कि वे अपने बागों की निरंतर निगरानी करें और जैसे ही 5-10 प्रतिशत बौर पर सफेद चूर्ण दिखे, तुरंत उपचार शुरू कर दें।
उत्तर प्रदेश और बिहार के बागवानों को अब मौसम की चाल को समझते हुए अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। बारिश के तुरंत बाद कीटों का हमला तेज होता है, इसलिए कीटनाशकों का छिड़काव हमेशा बारिश थमने और धूप निकलने के बाद ही करें। इस समय बागों में अधिक सिंचाई करने से बचें, क्योंकि मिट्टी में अतिरिक्त नमी बौर झड़ने का कारण बन सकती है। रसायनों के उपयोग के साथ-साथ बागों में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें और सूखी टहनियों को हटा दें ताकि धूप और हवा पेड़ के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच सके। समय पर की गई सावधानी न केवल आपकी फसल सुरक्षित रखेगी, बल्कि यूपी-बिहार के आमों की मिठास को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने में भी मदद करेगी।
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