अपराध

Purnia violence : पूर्णिया में खौफनाक हत्याकांड, अपराधियों का बोलबाला, पुलिस की लापरवाही ने फिर खोली पोल

Purnia violence  : बिहार में अपराध की घटनाएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं। राजधानी पटना से लेकर जिलों तक, हत्या, लूट और फायरिंग आम हो चुके हैं। वीवीआईपी इलाकों में जब गोलियों की आवाजें गूंजती हैं और अपराधी खुलेआम वारदात कर निकल जाते हैं, तो सवाल उठता है कि आम नागरिक आखिर कितने सुरक्षित हैं। पूर्णिया जिले के टेटगामा गांव में रविवार रात जो हुआ, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। एक ही परिवार के 5 लोगों को पेड़ से बांधकर पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया गया। इसमें तीन महिलाएं और दो पुरुष शामिल थे। यह घटना करीब 300 ग्रामीणों की मौजूदगी में हुई, लेकिन पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी।

12 घंटे बाद शव ढूंढ सकी टीम

घटना रात 9 बजे से 1 बजे तक चलती रही, लेकिन स्थानीय पुलिस को कोई सूचना नहीं मिली। जब सुबह पुलिस पहुंची तो न सिर्फ आरोपी फरार थे, बल्कि शवों को खोजने में भी 12 घंटे का समय लग गया। यह स्थिति पुलिस की विफलता का बड़ा उदाहरण बन गई है।

डायन के आरोप में की गई निर्मम हत्या

इस खौफनाक घटना के पीछे वजह बनी डायन का आरोप। गांव के ही रामदेव उरांव ने अपने बेटे की मौत का दोष बाबू लाल उरांव के परिवार पर मढ़ दिया। उसने दावा किया कि तंत्र-मंत्र से उसकी संतान की जान ली गई। इसके बाद पंचायत बैठी और भीड़ ने पांचों को पकड़कर पहले पीटा और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया।

300 की भीड़ ने देखी बर्बरता

इस भीड़ में सिर्फ टेटगामा के ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों के लोग भी शामिल थे। फिर भी किसी ने पुलिस को सूचना देना जरूरी नहीं समझा। चार घंटे तक ये अमानवीय कृत्य चलता रहा, लेकिन प्रशासन तक कोई खबर नहीं पहुंची। यह ग्रामीण चेतना और पुलिस तंत्र दोनों पर गंभीर सवाल उठाता है।

पुलिस अब जागी, दर्ज हुए 173 लोगों के खिलाफ केस

घटना के बाद पुलिस ने 23 नामजद और 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। अब तक तीन गिरफ्तारियां हुई हैं, लेकिन पंचायत में यह फैसला किसने लिया, इसकी जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है। एसडीपीओ पंकज शर्मा का दावा है कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा।

पांच महीनों में 116 हत्याएं,  सवालों के घेरे में नीतीश सरकार

बिहार में बढ़ते अपराध ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच महीनों में 116 हत्या के मामले दर्ज हुए हैं। विपक्ष लगातार नीतीश सरकार की नीतियों और पुलिस तंत्र की निष्क्रियता पर निशाना साध रहा है। आम जनता भी अब अपराध और प्रशासनिक विफलता से आक्रोशित नजर आ रही है। पूर्णिया की घटना ने बिहार की कानून व्यवस्था की हकीकत सामने रख दी है। सवाल यह है कि क्या अब भी सरकार और प्रशासन चेतेंगे या फिर आम लोगों की जान यूं ही जाती रहेगी?

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