Rahu Grah: रक्षाबंधन पर राहु का साया! बिना धड़ के कैसे अमर हुए राहु, जानें पूरी पौराणिक कथा

राहु को ज्योतिष में छाया ग्रह कहा जाता है, लेकिन इसके पीछे बेहद रोचक पौराणिक कथा छिपी है। समुद्र मंथन के दौरान स्वरभानु ने देवताओं के बीच बैठकर अमृत पी लिया था। सूर्य और चंद्रमा ने पहचान लिया, जिसके बाद भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग हुआ।

Rahu Grah:  रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके सुख, स्वास्थ्य तथा दीर्घायु की कामना करती है। धार्मिक मान्यताओं में राखी बांधने के लिए शुभ समय का विशेष महत्व बताया गया है। भद्रा की तरह राहुकाल को भी शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। इसलिए इस साल रक्षाबंधन पर राखी बांधने से पहले राहुकाल और शुभ मुहूर्त की जानकारी रखना उपयोगी होगा।

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28 अगस्त को मनाया जाएगा रक्षाबंधन

इस वर्ष रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार राखी बांधने के लिए सुबह का समय विशेष रूप से सुविधाजनक रहेगा। उपलब्ध मुहूर्त के मुताबिक, सुबह 5:57 बजे से 9:48 बजे तक राखी बांधी जा सकती है। वहीं, इसके बाद आने वाले राहुकाल में शुभ कार्य करने से बचने की धार्मिक मान्यता है।

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रक्षाबंधन पर राहुकाल का समय क्या रहेगा?

28 अगस्त को राहुकाल सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:22 बजे तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में राखी बांधने से बचना चाहिए। खास बात यह है कि राखी बांधने का बताया गया शुभ समय सुबह 9:48 बजे समाप्त हो जाएगा और राहुकाल करीब एक घंटे बाद शुरू होगा। इसलिए परिवार सुबह के समय ही राखी बांधने का कार्यक्रम आसानी से कर सकते हैं।

राहु को क्यों माना जाता है रहस्यमयी छाया ग्रह?

ज्योतिषीय मान्यताओं में राहु को रहस्यमयी छाया ग्रह कहा जाता है। पौराणिक कथाओं में उसका पूरा शरीर नहीं, बल्कि केवल सिर बताया गया है। इसके बावजूद ज्योतिष में राहु को अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। मान्यता है कि कुंडली में इसकी स्थिति व्यक्ति के जीवन में अचानक बड़े बदलाव ला सकती है। शुभ प्रभाव होने पर सफलता, प्रसिद्धि और धन मिलने की संभावना मानी जाती है, जबकि अशुभ स्थिति को भ्रम और मानसिक अस्थिरता से जोड़ा जाता है।

समुद्र मंथन से जुड़ी है राहु की कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के बाद जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत का वितरण हो रहा था, तब स्वर्भानु नामक असुर देवता का रूप धारण करके अमृत पान करने वालों की पंक्ति में बैठ गया। सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान कर भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी। इसके बाद भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया।

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अमृत की बूंदों से अमर हुआ राहु

मान्यता के अनुसार सुदर्शन चक्र चलने से पहले अमृत की कुछ बूंदें स्वर्भानु के गले से नीचे जा चुकी थीं। इसलिए उसका सिर अमर हो गया और उसे राहु कहा गया। वहीं उसके धड़ को केतु के नाम से जाना गया। इसी वजह से ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रहों के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है।

राहु को अचानक बदलाव का कारक माना जाता है

ज्योतिषीय मान्यताओं में राहु को माया, भ्रम, महत्वाकांक्षा और अचानक होने वाले परिवर्तन से जोड़ा जाता है। शुभ स्थिति में यह व्यक्ति को प्रतिष्ठा, बड़ा पद और आर्थिक सफलता दिला सकता है। वहीं प्रतिकूल प्रभाव होने पर भ्रम, बेचैनी और गलत निर्णय जैसी परिस्थितियां बनने की मान्यता है। राहु का किसी राशि पर अपना स्वामित्व नहीं माना जाता। इससे जुड़ा प्रमुख रत्न गोमेद बताया गया है।

तिरुनागेश्वरम मंदिर में राहु पूजा का महत्व

तमिलनाडु के तिरुनागेश्वरम स्थित श्री नागनाथस्वामी मंदिर को राहु से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों में माना जाता है। इसे राहु स्थलम भी कहा जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार यहां राहु की पूजा और अभिषेक करने से राहु संबंधी दोषों को शांत करने में सहायता मिलती है। मंदिर से जुड़ी एक मान्यता अभिषेक के दौरान शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले दूध के कुछ समय के लिए नीला दिखाई देने से संबंधित है।

राहुकाल में कौन से काम करने से बचें?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राहुकाल में नए शुभ कार्यों की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। इस अवधि में नया कारोबार शुरू करना, दुकान या प्रोजेक्ट का उद्घाटन, विवाह-सगाई, गृह प्रवेश, नामकरण, महत्वपूर्ण यात्रा और बड़े वित्तीय निर्णयों से बचने की सलाह दी जाती है। इसी तरह जमीन, मकान, वाहन या महंगी वस्तुओं की खरीद और महत्वपूर्ण समझौते करने को भी इस समय टालने की मान्यता है।

राहुकाल में पूजा और मंत्र जाप कर सकते हैं

राहुकाल को नए मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए प्रतिकूल माना जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान पूजा-पाठ और मंत्र जाप किए जा सकते हैं। राहु से संबंधित शांति के लिए भगवान शिव, काल भैरव और माता दुर्गा की उपासना करने की परंपरा भी बताई जाती है। हालांकि, शुभ मुहूर्त और राहुकाल के समय स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।

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Chandan Das

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