Raipur Poisonous Gas Death
Raipur Poisonous Gas Death: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में मानवता को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। रामकृष्ण केयर अस्पताल के परिसर में स्थित सेप्टिक टैंक की सफाई करने उतरे तीन मजदूरों की जहरीली गैस की चपेट में आने से दर्दनाक मौत हो गई। यह हादसा न केवल अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि उस कानून की धज्जियां भी उड़ाता है जो इंसानों द्वारा सीवर की सफाई (मैनुअल स्कैवेंजिंग) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। घटना के बाद से ही पूरे शहर में आक्रोश का माहौल है और पीड़ित परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है।
रामकृष्ण केयर अस्पताल में सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर तीन युवाओं—अनमोल माझी (25), गोविंद सेंद्रे (35) और प्रशांत (22)—को मौत के गड्ढे में उतार दिया गया। जैसे ही ये मजदूर टैंक के भीतर दाखिल हुए, वहां जमा जहरीली गैस ने उनका दम घोंट दिया। अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई पुख्ता सुरक्षा उपकरण या ऑक्सीजन मास्क उपलब्ध नहीं कराए गए थे। इस हादसे ने तीन घरों की खुशियां हमेशा के लिए छीन ली हैं। कहीं बूढ़े माता-पिता अपने बुढ़ापे की लाठी को याद कर बिलख रहे हैं, तो कहीं चार महीने का मासूम अपने पिता के साये से हमेशा के लिए महरूम हो गया है।
हादसे की खबर मिलते ही राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के उपाध्यक्ष हरदीप सिंह गिल ने घटनास्थल का दौरा किया। उन्होंने अस्पताल परिसर का निरीक्षण करने के बाद इसे ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ (हाथ से मैला ढोना) का स्पष्ट मामला करार दिया। गिल ने अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की और दो टूक शब्दों में कहा कि यह कानूनन प्रतिबंधित कार्य है। उन्होंने निर्देश दिया कि इस मामले में न केवल लापरवाही की धाराएं, बल्कि एससी/एसटी (SC/ST) एक्ट और मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट के तहत कड़ी एफआईआर दर्ज की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोषी चाहे अस्पताल का बड़ा अधिकारी हो या कोई कर्मचारी, किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
हरदीप सिंह गिल ने नगर निगम और संबंधित विभागों को भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त हिदायत दी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सीवर सफाई को लेकर जो सुरक्षा मानक और दिशा-निर्देश तय किए हैं, उनका पालन कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है। आयोग को देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी शिकायतें मिल रही थीं, जिसके बाद टीम रायपुर पहुँची। आयोग ने अस्पताल प्रबंधन की भूमिका की गहन जांच करने और मृतकों के आश्रितों को उचित मुआवजा व न्याय दिलाने का भरोसा दिलाया है।
दैनिक भास्कर की टीम जब भाठागांव की बीएसयूपी कॉलोनी पहुँची, तो वहां का मंजर हृदयविदारक था। सबसे छोटा भाई प्रशांत, जो घर का लाड़ला था, उसकी मौत की खबर से उसकी मां और बहनें बेसुध थीं। उसकी बहन ने बताया कि उन्हें धोखे में रखा गया था कि गड्ढा छोटा है। वहीं, प्रशांत के घर के पीछे रहने वाले अनमोल की पत्नी अपने चार महीने के बच्चे को कलेजे से लगाए सदमे में बैठी थी। अनमोल सुबह साढ़े सात बजे घर से यह कहकर निकला था कि काम पर जा रहा है, लेकिन उसे क्या पता था कि वह दोबारा अपनी पत्नी और नन्हे बेटे का चेहरा नहीं देख पाएगा।
इस पूरी त्रासदी ने आधुनिक चिकित्सा संस्थानों के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। एक तरफ जहां अस्पताल जीवन बचाने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी लापरवाही ने तीन बेगुनाह मजदूरों की बलि ले ली। स्थानीय लोगों और नागरिक समाज ने मांग की है कि जांच केवल छोटे ठेकेदारों तक सीमित न रहे, बल्कि अस्पताल के उन बड़े प्रबंधकों पर भी कार्रवाई हो जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर मजदूरों को मौत के टैंक में उतारा। पुलिस अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आयोग के निर्देशों के आधार पर मामले की अगली वैधानिक कार्रवाई में जुट गई है।
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