Rajasthan Wildlife
Rajasthan Wildlife: राजस्थान का नाम सुनते ही अक्सर आँखों के सामने थार के रेगिस्तान की तस्वीर उभरती है, लेकिन प्रदेश का दक्षिणी और पूर्वी हिस्सा जैव विविधता के मामले में किसी खजाने से कम नहीं है। हाल ही में प्रतापगढ़ जिले से वन्यजीव प्रेमियों और वैज्ञानिकों के लिए एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है। एक नवीनतम वैज्ञानिक शोध के अनुसार, राजस्थान में पहली बार सांपों की दो अत्यंत दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। यह महत्वपूर्ण जानकारी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘जर्नल ऑफ थ्रेटन्ड टैक्सा’ (Journal of Threatened Taxa) में प्रकाशित हुई है, जिसने राजस्थान के वन्यजीव मानचित्र पर प्रतापगढ़ की अहमियत को और बढ़ा दिया है।
इस शोध अध्ययन को वैज्ञानिक विवेक शर्मा, बी.एल. मेघवाल, लव कुमार जैन और धर्मेंद्र खंडाल की टीम ने संयुक्त रूप से अंजाम दिया है। रिसर्च के मुताबिक, Wallophis brachyura (इंडियन स्मूथ स्नेक) और Calliophis melanurus (स्लेंडर कोरल स्नेक) नाम की ये दो प्रजातियां अब तक राजस्थान के किसी भी रिकॉर्ड में शामिल नहीं थीं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अरावली पहाड़ियों के पूर्व में स्थित यह इलाका अपनी नमी और हरियाली के कारण कई ऐसे जीवों का घर हो सकता है, जिनकी खोज अभी बाकी है। यह खोज इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि पूर्वी राजस्थान के पारिस्थितिकी तंत्र पर अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है।
प्रजाति Wallophis brachyura को पहली बार 30 मार्च 2024 को प्रतापगढ़ शहर के एक रिहायशी इलाके में देखा गया। यह सांप एक घर के दरवाजे के फ्रेम में छिपा हुआ मिला था, जिसे बाद में सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया। ऐतिहासिक रूप से यह सांप मुख्य रूप से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में पाया जाता रहा है, हालांकि हाल के वर्षों में इसके कुछ साक्ष्य गुजरात और कर्नाटक में भी मिले हैं। राजस्थान में इसका मिलना इस प्रजाति के भौगोलिक विस्तार को समझने में बड़ी कामयाबी है। शारीरिक बनावट की बात करें तो यह सांप छोटा और पतला होता है, जिसका सिर गर्दन से थोड़ा चौड़ा और पेट सफेद रंग का होता है।
दूसरी दुर्लभ प्रजाति Calliophis melanurus, जिसे ‘स्लेंडर कोरल स्नेक’ कहा जाता है, के जिले में कुल तीन रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं। पहला मामला फरवरी 2021 में सामने आया, जबकि जुलाई 2025 में दलोट गांव के एक स्कूल और दुकान से दो छोटे सांप मिले। ये सांप दिखने में बेहद आकर्षक लेकिन छोटे होते हैं। इनकी लंबाई महज 14 से 15 सेंटीमीटर दर्ज की गई है। इनका सिर और गर्दन काली होती है जिस पर सफेद धब्बे नजर आते हैं, जबकि शरीर भूरा और पेट का पिछला हिस्सा चटकीले नारंगी रंग का होता है। भारत के अन्य हिस्सों में पाए जाने के बावजूद राजस्थान के लिए यह एक नई एंट्री है।
वैज्ञानिकों ने शोध में इस बात पर जोर दिया है कि राजस्थान केवल रेतीला प्रदेश नहीं है। अरावली के पूर्वी ढलानों पर होने वाली अधिक बारिश और वहां के घने जंगल जीवों के लिए एक आदर्श वातावरण तैयार करते हैं। प्रतापगढ़ जैसे जिलों में इस तरह की खोजें बताती हैं कि यहाँ कई ऐसी गुप्त प्रजातियां हो सकती हैं जो अब तक विज्ञान की नजरों से ओझल हैं। इस खोज के बाद अब विशेषज्ञों ने मांग की है कि दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में नियमित वन्यजीव सर्वेक्षण और गहन शोध किए जाएं, ताकि विलुप्तप्राय या दुर्लभ जीवों का संरक्षण समय रहते सुनिश्चित किया जा सके।
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