पशु-पक्षी

NTCA Tiger Mortality: 88 बाघों की मौत की जांच होगी बंद, RTI से हुआ सरकारी लापरवाही का खुलासा

NTCA Tiger Mortality : भारत के राष्ट्रीय पशु बाघों के संरक्षण को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) से प्राप्त आंकड़ों से पता चला है कि वर्ष 2020-21 के दौरान हुई बाघों की 88 मौतों की जांच अब तक लंबित या समीक्षाधीन (Under Scrutiny) है। वर्षों बीत जाने के बाद भी इन मौतों के सटीक कारणों का पता नहीं चल पाया है। अब खबर है कि एनटीसीए इन पेंडिंग केसों को हमेशा के लिए बंद करने की तैयारी कर रहा है, जिससे वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों के बीच गहरी चिंता व्याप्त है।

दस्तावेजों के अभाव में जांच खत्म करने की तैयारी

एनटीसीए ने इस वर्ष जनवरी में राज्यों को एक सख्त पत्र लिखकर अपनी मंशा साफ कर दी थी। पत्र में उल्लेख किया गया है कि यदि संबंधित राज्य सरकारें बाघों की मौत के मामलों में आवश्यक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रदान नहीं करती हैं, तो इन जांचों को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया जाएगा। इनमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फोरेंसिक विश्लेषण, हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट और घटनास्थल की रंगीन तस्वीरें शामिल हैं। अथॉरिटी का तर्क है कि राज्यों की विफलता के कारण इन फाइलों को अनिश्चितकाल तक खुला नहीं रखा जा सकता, जबकि दूसरी ओर यह शिकारियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई को कमजोर करने जैसा कदम है।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सर्वाधिक पेंडिंग केस

बाघों के घर कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में स्थिति सबसे खराब है। आंकड़ों के मुताबिक, अकेले मध्य प्रदेश में 32 बाघों की मौत की जांच अभी तक अधर में लटकी हुई है। इनमें बांधवगढ़, कान्हा और पन्ना जैसे विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व के संवेदनशील मामले शामिल हैं। वहीं, महाराष्ट्र में भी 20 मामले अनसुलझे हैं, जिनमें से कई मौतें संरक्षित क्षेत्रों (Reserves) के बाहर हुई हैं। छत्तीसगढ़ में बस्तर, कवर्धा और भानुप्रतापपुर जैसे इलाकों में भी जांच की रफ्तार सुस्त है, जिससे वहां की निगरानी प्रणाली पर बड़े सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।

काजीरंगा और कॉर्बेट जैसे सुरक्षित क्षेत्रों की स्थिति भी खराब

हैरानी की बात यह है कि देश के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले नेशनल पार्कों में भी बाघों की मौत के निष्कर्ष नहीं निकल पा रहे हैं। असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में 2020 से 8 मामले ठंडे बस्ते में हैं। इसी तरह, कर्नाटक के नागरहोल, उत्तर प्रदेश के दुधवा, पीलीभीत और उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में भी कई मौतें बिना किसी ठोस कारण के दर्ज हैं। कई मामलों को ‘जब्ती’ (Seizure) के रूप में चिह्नित किया गया है, जिसका अर्थ है कि संदिग्ध शिकारियों से बाघ के अंग तो मिले, लेकिन पुलिस और वन विभाग कानूनी और फोरेंसिक प्रक्रियाओं को पूरा करने में विफल रहे।

डेटा लॉन्ड्रिंग का आरोप और विशेषज्ञों की राय

प्रसिद्ध वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने इस प्रशासनिक प्रक्रिया की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे ‘एडमिनिस्ट्रेटिव डेटा लॉन्ड्रिंग’ करार देते हुए कहा कि जांच में जानबूझकर देरी की जाती है ताकि अंततः सबूतों के अभाव में केस बंद किए जा सकें। दुबे के अनुसार, जब तक मौत का सटीक कारण तय नहीं होगा, तब तक न तो भविष्य की रणनीतियां बन पाएंगी और न ही शिकारियों को सजा मिल पाएगी। यह लापरवाही केवल फाइलों को साफ करने की कोशिश है, न कि वन्यजीवों को न्याय दिलाने की। अगर ये केस बंद होते हैं, तो यह बाघ संरक्षण के मिशन के लिए एक बड़ा झटका होगा।

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