Rajya Sabha Election 2026 : राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन रद्द होने के मामले में सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत न मिलने के बाद, कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन ने अपनी पहली और तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च चुनावी संस्था, यानी निर्वाचन आयोग (EC) को निशाने पर लिया। मीनाक्षी नटराजन ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी शिकायत दर्ज कराने के बाद भी पूरे ४८ घंटों तक आयोग की तरफ से कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आखिर चुनाव आयोग ने ४८ घंटे तक चुप्पी क्यों साधे रखी? कांग्रेस नेता के अनुसार, इस लंबी खामोशी से साफ पता चलता है कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता अब पूरी तरह से दांव पर लग चुकी है और उनकी कार्यप्रणाली पर संदेह करना स्वाभाविक है।

सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद आया तीखा बयान
उच्चतम न्यायालय द्वारा याचिका खारिज किए जाने के तुरंत बाद मीडिया से बात करते हुए मीनाक्षी नटराजन का दर्द और आक्रोश साफ झलका। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, ‘चुनाव आयोग ने हमारी जायज शिकायतों पर ४८ घंटे तक कोई एक्शन नहीं लिया और न ही कोई जवाब देना मुनासिब समझा। इस रवैये से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि चुनाव आयोग कहीं न कहीं समझौता कर चुका है।’ उन्होंने आरोप लगाया कि इस राज्यसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की धज्जियां उड़ाई गईं। विपक्ष की आवाज को दबाने और एकतरफा निर्णय लेने के लिए तंत्र का दुरुपयोग किया गया, जिससे चुनाव प्रणाली की साख को गहरा धक्का लगा है।

‘अदालत ने कम से कम हमारा पक्ष तो सुना
सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका खारिज होने के बावजूद मीनाक्षी नटराजन ने न्यायपालिका के प्रति सम्मान व्यक्त किया, लेकिन साथ ही अपनी बात भी मजबूती से रखी। उन्होंने कहा कि भले ही उन्हें अदालत से कोई कानूनी राहत नहीं मिल पाई, लेकिन वे इस बात से संतुष्ट हैं कि कम से कम देश की सबसे बड़ी अदालत ने उनकी दलीलों और उनके पक्ष को ध्यान से सुना। उन्होंने न्यायिक मर्यादा का पालन करते हुए कहा, ‘मैं सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर किसी भी तरह की कोई व्यक्तिगत या राजनीतिक टिप्पणी नहीं करना चाहती। न्यायपालिका का अपना एक दायरा है, लेकिन हमारे लिए यह महत्वपूर्ण था कि हमारा पक्ष रिकॉर्ड पर आया।’
मध्य प्रदेश सरकार के वकीलों की मौजूदगी पर उठाए सवाल
कांग्रेस नेता ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ी राजनीतिक सांठगांठ होने का दावा किया है। उन्होंने इस बात पर गहरा आश्चर्य और आपत्ति जताई कि जब उनकी शिकायत का मध्य प्रदेश की राज्य सरकार से सीधे तौर पर कोई लेना-देना या संबंध नहीं था, तो फिर अदालत में राज्य सरकार के वकील क्यों मुस्तैद थे? नटराजन ने आरोप लगाया, ‘आज इस मामले की पैरवी के दौरान वे लोग खुद-ब-खुद बेनकाब हो गए हैं। सरकारी मशीनरी और सत्ताधारी दल की जो सांठगांठ पर्दे के पीछे चल रही थी, वह अब सबके सामने आ चुकी है।’ उनके मुताबिक, यह पूरी कवायद विपक्ष को चुनावी रेस से बाहर करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार
इससे पहले, शुक्रवार को देश की शीर्ष अदालत ने मीनाक्षी नटराजन द्वारा दायर की गई विशेष अनुमति याचिका को सुनने के बाद खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में बेहद स्पष्ट रूप से कहा कि एक बार जब देश में चुनावी प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर शुरू हो जाती है, तो न्यायपालिका के पास उसमें सीधे हस्तक्षेप करने के अधिकार सीमित हो जाते हैं। कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए साफ किया कि चुनाव के इस अंतिम चरण में न्यायिक दखल की अपनी सीमाएं तय हैं, इसलिए इस मोड़ पर चुनाव प्रक्रिया को रोकने या उसमें बदलाव करने का कोई आदेश नहीं दिया जा सकता।
इस वजह से रद्द हुआ था नामांकन
इस पूरे विवाद की जड़ मध्य प्रदेश में हो रहे राज्यसभा चुनाव के दौरान नामांकन पत्रों की जांच (स्क्रूटनी) से जुड़ी है। जांच के वक्त कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के पर्चे को निरस्त कर दिया गया था। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर से उनके नामांकन पर यह कड़ी आपत्ति दर्ज कराई गई थी कि नटराजन ने अपने चुनावी हलफनामे में तेलंगाना राज्य से संबंधित एक पुराने अदालती मामले की अनिवार्य जानकारी छिपाई है। निर्वाचन अधिकारी ने जांच में इस जानकारी के अभाव को एक गंभीर त्रुटि माना और उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया। इसके बाद, मैदान में बचे इकलौते मुख्य दावेदार और भाजपा उम्मीदवार महेश केवट का निर्विरोध राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होना पूरी तरह तय हो गया।
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