Bihar Police News
Bihar Police News: बिहार के रोहतास जिले के नौहट्टा थाना क्षेत्र से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने कानूनी प्रक्रिया और पुलिस की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ महज 9 साल की उम्र के एक मासूम बच्चे के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (नृशंसता निवारण) अधिनियम यानी एससी-एसटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह मामला मूल रूप से बच्चों के बीच खेल-खेल में हुई मामूली कहासुनी और मारपीट से शुरू हुआ था, लेकिन पुलिस की कार्रवाई ने इसे एक बेहद गंभीर आपराधिक मामले में तब्दील कर दिया। जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, पूरे इलाके में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया और लोग इस कठोर कानून के कथित दुरुपयोग को लेकर आक्रोश जता रहे हैं।
पूरे मामले की शुरुआत दिसंबर 2025 में हुई थी। बताया जा रहा है कि 7 दिसंबर 2025 को बच्चों के बीच हुए झगड़े के बाद एक पक्ष की मां ने थाने में लिखित आवेदन दिया था। पुलिस ने इस आवेदन के आधार पर त्वरित कार्रवाई करते हुए चार बच्चों सहित अन्य लोगों को नामजद आरोपी बनाया। आरोप लगाया गया था कि बच्चों के बीच मारपीट के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल और गाली-गलौज की गई। हालांकि, सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करते समय आरोपियों की उम्र की पुष्टि करना जरूरी नहीं समझा। एफआईआर में कई महत्वपूर्ण कॉलम खाली छोड़ दिए गए थे, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर लापरवाही के बादल मंडरा रहे हैं।
जब यह मामला कानूनी प्रक्रिया के तहत गुरुवार, 19 फरवरी 2026 को किशोर न्याय परिषद (Juvenile Justice Board) के सामने पहुंचा, तो वहां मौजूद अधिकारी दंग रह गए। बोर्ड के मजिस्ट्रेट अमित कुमार पांडेय और सदस्य तेज बली सिंह के सामने जब उस ‘आरोपी’ बच्चे को पेश किया गया, तो उसकी मासूमियत और कम उम्र (करीब 9 से 10 वर्ष) देखकर बोर्ड ने गहरी नाराजगी जताई। बोर्ड ने पाया कि पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करते समय न्यूनतम कानूनी औपचारिकताओं का भी पालन नहीं किया था। न तो बच्चों की उम्र का उल्लेख था और न ही वयस्कों की आयु स्पष्ट की गई थी। परिषद ने इसे किशोर न्याय अधिनियम के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन माना।
इस गंभीर चूक को देखते हुए किशोर न्याय परिषद ने कड़ा रुख अपनाया है। बोर्ड ने मासूम बच्चे को तुरंत उसके अभिभावकों के सुपुर्द करने का आदेश दिया। साथ ही, नौहट्टा थानाध्यक्ष दिवाकर कुमार को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए 24 घंटे के भीतर लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया है। परिषद ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि थानाध्यक्ष का जवाब संतोषजनक नहीं मिला, तो मामले की रिपोर्ट वरीय पुलिस अधिकारियों और विभाग को भेजी जाएगी। बोर्ड का मानना है कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में पुलिस को अत्यधिक संवेदनशील होना चाहिए, न कि बिना जांच के गंभीर धाराओं का प्रयोग करना चाहिए।
इस पूरे विवाद पर नौहट्टा थानाध्यक्ष दिवाकर कुमार का कहना है कि उन्होंने केवल अपनी ड्यूटी निभाई है। उनका तर्क है कि थाने में जो आवेदन प्राप्त हुआ था, उसी के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई। उनके अनुसार, वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश हैं कि पीड़ित द्वारा दिए गए आवेदन पर बिना देरी किए केस दर्ज किया जाए। थानाध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच (अनुसंधान) अभी जारी है और यदि जांच में बच्चे की उम्र या आरोपों की सत्यता पर कोई नया तथ्य सामने आता है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना केवल एक बच्चे पर केस दर्ज होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे कानूनी तंत्र की खामियों को भी उजागर करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि एससी-एसटी एक्ट जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल बच्चों के आपसी झगड़ों में करना कानून की मूल भावना के विपरीत है। 9 साल का बच्चा कानूनी रूप से इतना परिपक्व नहीं होता कि वह ऐसे अपराधों की गंभीरता को समझ सके। अब सबकी नजरें पुलिस के जवाब और कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या इस मासूम को इस कानूनी पचड़े से राहत मिल पाती है या नहीं।
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