Russian Oil Row
Russian Oil Row: भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंधों के बीच एक अमेरिकी सिनेटर के बयान ने देश की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। अमेरिकी सिनेटर लिंडसे ग्राहम ने दावा किया है कि भारतीय राजनयिकों ने अमेरिका से टैरिफ (आयात शुल्क) में कटौती की मांग की है। ग्राहम के अनुसार, भारत की ओर से यह तर्क दिया गया है कि चूंकि भारत अब रूस से कच्चा तेल खरीदना कम कर रहा है, इसलिए अमेरिका को व्यापारिक शुल्कों में रियायत देनी चाहिए। इस खुलासे के बाद भारत में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। विपक्षी दल इसे भारत की विदेश नीति में एक बड़े बदलाव और रूस जैसे भरोसेमंद साथी के साथ संबंधों में आती खटास के रूप में देख रहे हैं।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सिनेटर लिंडसे ग्राहम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया है, जिसने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस वीडियो में ग्राहम यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि लगभग एक महीने पहले वे भारतीय राजदूत के आवास पर थे। सिनेटर का दावा है कि वहां मुख्य रूप से इसी बात पर चर्चा हुई कि भारत किस तरह रूसी तेल पर अपनी निर्भरता घटा रहा है। ग्राहम ने आगे कहा कि भारतीय राजदूत चाहते थे कि यह संदेश नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक पहुँचाया जाए, ताकि भारत को अमेरिकी व्यापार नीतियों और टैरिफ में कुछ विशेष छूट मिल सके। कांग्रेस ने इस दावे को आधार बनाकर केंद्र की मोदी सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी का कहना है कि भारत का रूस के साथ दशकों पुराना ‘सदाबहार’ रिश्ता रहा है, जिसे अब खतरे में डाला जा रहा है। कांग्रेस के अनुसार, रूस ने संकट के समय हमेशा भारत का साथ दिया और रियायती दरों पर तेल उपलब्ध कराकर देश की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। अब व्यक्तिगत जनसंपर्क (PR) को चमकाने और व्हाइट हाउस के साथ करीबी दिखाने के चक्कर में रूस से तेल की खरीद कम करना भारत के दीर्घकालिक हितों के साथ खिलवाड़ है।
कांग्रेस पार्टी ने अपनी प्रतिक्रिया में यह भी पूछा कि आखिर मोदी सरकार देश के आर्थिक नुकसान की कीमत पर अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश करने की नीति क्यों अपना रही है? विपक्ष का तर्क है कि यदि रूस से सस्ता तेल मिलना बंद होता है, तो इसका सीधा असर देश में ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ेगा। कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा कि क्या भारत की विदेश नीति अब केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और अमेरिकी प्रशासन को प्रभावित करने तक सीमित रह गई है? पार्टी ने मांग की है कि सरकार इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे और बताए कि क्या वाकई रूसी तेल की खरीद में कटौती की जा रही है और इसके पीछे की वास्तविक वजह क्या है।
फिलहाल इस पूरे मामले पर भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन जानकारों का मानना है कि यह स्थिति काफी संवेदनशील है। रूस वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। ऐसे में अमेरिकी सिनेटर के इस दावे से मॉस्को और नई दिल्ली के बीच अविश्वास की स्थिति पैदा हो सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से बढ़ते दबाव और टैरिफ युद्ध की धमकियों के बीच भारत एक कठिन संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस ‘ट्रंप कार्ड’ और ‘रूस फैक्टर’ के बीच कूटनीतिक संतुलन कैसे कायम रखती है।
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