केरल

Sabarimala Row: सुप्रीम कोर्ट ने वकील को दी नसीहत, कहा- “अदालत में केवल कानूनी दलीलों के लिए जगह है”

Sabarimala Row:  केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों के स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का दौर जारी है। 7 अप्रैल से शुरू हुई इस महत्वपूर्ण सुनवाई में नौ जजों की संविधान पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि धार्मिक परंपराएं और संवैधानिक अधिकार एक-दूसरे के साथ कैसे तालमेल बिठा सकते हैं। केंद्र सरकार ने इस मामले में परंपराओं के पक्ष में दलील देते हुए कहा है कि देश में कई ऐसे देवी मंदिर भी हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है, इसलिए सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान करना अनिवार्य है।

अदालत की नाराजगी: मुद्दे से भटकने पर वकील को फटकार

मंगलवार की कार्यवाही के दौरान एक अजीब स्थिति पैदा हो गई जब एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने अपनी दलीलों में धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देना शुरू कर दिया। जस्टिस महादेवन और अन्य जजों की बेंच ने उन्हें कई बार टोकते हुए कहा कि वे अपनी बात केवल उन कानूनी बिंदुओं तक सीमित रखें जिन पर अदालत विचार कर रही है। बेंच ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत विचारधारा और इतिहास की व्याख्या के बजाय संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 25 और 26) पर ध्यान केंद्रित करना अधिक आवश्यक है।

ऐतिहासिक विभाजन और भविष्य की चिंता: वकील के तर्क

अपनी दलील पेश करते हुए अश्विनी उपाध्याय ने दावा किया कि ‘धर्म’ शब्द का अंग्रेजी में कोई सटीक अनुवाद नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि पिछले 2000 वर्षों में सांप्रदायिक संघर्षों के कारण भारत 25 टुकड़ों में विभाजित हुआ और पिछले 200 वर्षों में 7 अलग देशों का निर्माण हुआ। उन्होंने पीठ को चेतावनी देते हुए कहा कि अदालत को अपने फैसलों के दूरगामी परिणामों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अगले 25 वर्षों में भारत, जापान या सिंगापुर जैसा वैज्ञानिक देश बनेगा, या फिर पड़ोसी देशों की तरह धार्मिक कट्टरता की राह पर निकल जाएगा।

संविधान और अनुच्छेद 25: पश्चिमी देशों से तुलना

उपाध्याय ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 को बहुत ही प्रतिबंधात्मक तरीके से लिखा गया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिस तरह से भारत में धर्म के प्रचार के अधिकार को मान्यता दी गई है, वह कई उन पश्चिमी देशों के संविधानों में भी नहीं है जिनसे भारतीय संविधान ने कुछ पहलुओं को अपनाया है। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं और पंथ बनाम धर्म की श्रेष्ठता पर अपनी बात रखते हुए अदालत को अपने शोध से अवगत कराने की कोशिश की।

भाषा और डॉ. अंबेडकर का संदर्भ: संस्कृत बनाम अंग्रेजी

बहस के दौरान उपाध्याय ने भाषाई बारीकियों का जिक्र करते हुए कहा कि संस्कृत में अंग्रेजी की तुलना में अधिक अक्षर हैं। उन्होंने दावा किया कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने एक बार संस्कृत को राजभाषा बनाने के लिए विधेयक पेश किया था। उनके अनुसार, अंग्रेजी में केवल 26 अक्षर होने के कारण यह भाषा ‘धर्म’ और ‘संविधान’ जैसे गहन शब्दों की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है, जबकि संस्कृत के 52 अक्षर अधिक सटीक हैं। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा में धर्म को शामिल करने के लिए अपनी ओर से दायर एक अन्य जनहित याचिका का भी उल्लेख किया।

धार्मिक ग्रंथों का प्रदर्शन और जस्टिस महादेवन की टिप्पणी

उपाध्याय ने पीठ के सामने रामायण, विष्णु पुराण और भगवद् गीता की प्रतियां दिखाते हुए तर्क दिया कि ये ग्रंथ कभी यह नहीं कहते कि इनका पालन न करने वाला नरक जाएगा। उन्होंने जजों को ‘महामहिम’ कहने की परंपरा को ‘पंच परमेश्वर’ से जोड़ा। इस पर न्यायमूर्ति महादेवन ने सख्त नाराजगी जताते हुए कहा, “आप मूल विषय से पूरी तरह भटक रहे हैं। यदि संस्कृत में 52 अक्षर हैं, तो तमिल में 247 अक्षर हैं। इन विषयों पर जाने की आवश्यकता नहीं है।” कोर्ट ने कड़े शब्दों में वकील को केवल कानूनी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया।

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