Election Reform Petition
Election Reform Petition: देश में लोकतांत्रिक शुचिता को बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के दौरान किए जाने वाले खर्च की सीमा तय करने की मांग पर संज्ञान लिया है। अदालत ने इस संबंध में केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को औपचारिक नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है। यह जनहित याचिका (PIL) प्रसिद्ध गैर-सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज़’ (Common Cause) द्वारा दायर की गई है। याचिका का मुख्य आधार यह है कि चुनावों में धनबल का अनियंत्रित इस्तेमाल निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा के विपरीत है।
याचिकाकर्ता संगठन का तर्क है कि वर्तमान में व्यक्तिगत उम्मीदवारों के लिए तो चुनाव खर्च की एक निर्धारित सीमा है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए ऐसी कोई स्पष्ट या प्रभावी सीमा मौजूद नहीं है। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने याचिकाकर्ता की ओर से दलील देते हुए कहा कि चुनाव के दौरान करोड़ों-अरबों रुपये का खर्च न केवल लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाता है, बल्कि यह अमीर और गरीब दलों के बीच के चुनावी मैदान को असंतुलित कर देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक दलों के खर्च पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक पारदर्शी चुनाव का सपना अधूरा रहेगा।
सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले का भी स्मरण कराया जो ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ (चुनावी चंदा) मामले में दिया गया था। उन्होंने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि अनियंत्रित और अज्ञात धनबल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विकृत करता है। यह न केवल चुनावी शुचिता को प्रभावित करता है, बल्कि मतदाताओं के ‘सूचना के अधिकार’ में भी बाधा डालता है, क्योंकि उन्हें यह पता नहीं चल पाता कि किस दल को कौन और कितना वित्तपोषित कर रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉय माल्या बागची ने इस मांग से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों पर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने टिप्पणी की कि चुनाव खर्च को नियंत्रित करना एक जटिल कार्य है। जस्टिस बागची ने अमेरिका जैसे विकसित लोकतंत्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां चुनाव खर्च की सीमाएं होने के बावजूद, लोग ‘तीसरे पक्ष’ या मित्रों और सहयोगियों के माध्यम से पैसा खर्च करने के रास्ते निकाल लेते हैं। अदालत ने यह संकेत दिया कि केवल नियम बनाना काफी नहीं है, बल्कि इसके कार्यान्वयन की चुनौतियों पर भी विचार करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को अपना जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि इस अवधि के भीतर सभी संबंधित पक्ष अपनी दलीलें और धनबल के दुरुपयोग को रोकने के संभावित उपायों पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इस याचिका का परिणाम भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़ा बदलाव ला सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर उन संसाधनों को प्रभावित करेगा जिनके दम पर आधुनिक चुनाव लड़े जाते हैं।
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