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Secret of Parikrama : किस भगवान की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

Secret of Parikrama: परंपराओं और धार्मिक शास्त्रों में भगवान की परिक्रमा या प्रदक्षिणा का अत्यंत महत्व माना गया है। परिक्रमा केवल भक्ति और सम्मान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम भी होती है। मंदिरों में भक्तजन भगवान की परिक्रमा कर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर भगवान की परिक्रमा की संख्या और तरीका अलग होता है? आइए जानते हैं परिक्रमा के रहस्य और शास्त्रों में वर्णित नियम।

परिक्रमा का महत्व और दिशा

संस्कृत में परिक्रमा को प्रदक्षिणा कहा जाता है, जिसका अर्थ है भगवान की मूर्ति या प्रतिष्ठान के चारों ओर दाईं ओर घूमना। यह सूर्य की गति का प्रतीक है, जिसे शुभ और मंगलकारी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार परिक्रमा से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन में संतुलन, एकाग्रता व शांति आती है। परिक्रमा करते समय भगवान को दाईं ओर रखना अनिवार्य माना जाता है।

शिवलिंग की परिक्रमा: अधूरी क्यों?

शिवजी की परिक्रमा बाकी देवताओं से भिन्न होती है। मंदिर परंपरा के अनुसार शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती, बल्कि अर्ध-परिक्रमा (आधा चक्कर) ही लगाना शुभ माना जाता है। इसका कारण यह है कि शिवलिंग के पीछे माता पार्वती का स्थान होता है, जिसकी परिक्रमा नहीं की जाती। इसलिए भक्त केवल शिवलिंग के सामने और एक तरफ से ही परिक्रमा करते हैं। साथ ही शिवलिंग की जलाधारी (जल से सजी) को भी छूने या उसके पीछे से जाने की अनुमति नहीं होती।

विष्णु और उनके अवतारों की परिक्रमा

विष्णु भगवान और उनके अवतार जैसे श्रीराम और श्रीकृष्ण की परिक्रमा पूर्ण रूप से की जाती है। आम तौर पर तीन या चार बार परिक्रमा करना सामान्य है। खास अवसरों जैसे जन्माष्टमी, रामनवमी आदि पर भक्त पाँच या सात बार परिक्रमा भी करते हैं, क्योंकि विषम संख्या को शास्त्रों में शुभ माना जाता है। इससे पूजा का प्रभाव और भी अधिक फलदायी होता है।

माता की परिक्रमा: विषम संख्याओं का महत्व

दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती जैसी मातृदेवियों की परिक्रमा में विषम संख्याओं का विशेष महत्व होता है। रोजाना तीन बार परिक्रमा करना पर्याप्त माना जाता है, लेकिन नवरात्र जैसे विशेष पर्वों पर सात बार तक परिक्रमा की जाती है। यह संख्या शक्ति, ऊर्जा और भक्ति का प्रतीक है और माता के प्रति पूर्ण समर्पण दर्शाती है।

गणेश और हनुमान की परिक्रमा

गणेश जी, जो विघ्नहर्ता कहलाते हैं, उनकी परिक्रमा आमतौर पर एक से तीन बार की जाती है। गणपति पूजा की शुरुआत भी इसी नियम से होती है। वहीं हनुमान जी की परिक्रमा संकटमोचन मानी जाती है। सामान्यतः भक्त एक परिक्रमा करते हैं, लेकिन संकटमोचन या विशेष संकल्प के समय तीन से ग्यारह बार तक परिक्रमा करने की परंपरा है।

हर देवता की परिक्रमा की संख्या और तरीका शास्त्र, आगम और स्थानीय परंपराओं पर निर्भर करता है। पूरे भारत में एक समान नियम नहीं है। लेकिन एक बात सभी में समान है—परिक्रमा हमेशा दाईं ओर (घड़ी की दिशा में) करनी चाहिए। संख्या चाहे जितनी भी हो, असली महत्व भक्त के भाव, श्रद्धा और भक्ति का होता है। यही आस्था भगवान को प्रसन्न करती है और परिक्रमा को पूर्ण बनाती है।

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