Shashi Tharoor:
Shashi Tharoor : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने केंद्र की मोदी सरकार की कार्यशैली पर कटाक्ष करते हुए एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। केरल विधानसभा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव (KLIBF) के चौथे संस्करण में शिरकत करते हुए थरूर ने कहा कि वह वर्तमान सरकार को सीधे तौर पर ‘लोकतंत्र-विरोधी’ नहीं कहेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह सरकार ‘नेहरू-विरोधी’ है। थरूर के अनुसार, वर्तमान सत्ता पक्ष ने देश की हर समस्या के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक “सुविधाजनक बलि का बकरा” बना दिया है, जो कि अनुचित है।
शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे नेहरू के दृष्टिकोण और उनके द्वारा रखे गए भारतीय लोकतंत्र के आधार की गहरी प्रशंसा करते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे उनकी हर नीति का आंख मूंदकर समर्थन करते हैं। थरूर ने निष्पक्षता से स्वीकार किया कि नेहरू से कुछ गलतियाँ हुई होंगी और उनका विश्लेषण जरूरी है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नेहरू भारतीय लोकतंत्र के संस्थापक थे और उन्होंने इसे मजबूती से स्थापित किया। आज की समस्याओं के लिए दशकों पहले के नेतृत्व को अकेले जिम्मेदार ठहराना तर्कसंगत नहीं है।
अपनी साहित्यिक यात्रा को साझा करते हुए थरूर ने बताया कि उनका लेखक बनने का सफर शारीरिक चुनौतियों से शुरू हुआ था। बचपन में अस्थमा की बीमारी के कारण वे बाहर खेलने नहीं जा पाते थे, जिसके चलते किताबों ने उनकी सबसे अच्छी साथी की जगह ले ली। उस दौर में तकनीक का अभाव था, जिसने उन्हें पढ़ने और लिखने की संस्कृति से गहराई से जोड़ा। उन्होंने बताया कि ‘श्री नारायना गुरू’ की जीवनी उनकी 28वीं पुस्तक है। उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि समय की कमी को देखते हुए आज छोटी और प्रभावी किताबें अधिक प्रासंगिक हैं।
पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार ने विभिन्न महत्वपूर्ण चर्चाओं के दौरान जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को कटघरे में खड़ा किया है। संसद के पटल पर सरकार ने कई बार नेहरू काल के निर्णयों को ‘ऐतिहासिक भूल’ करार दिया है। चीन सीमा पर 1962 की हार हो या कश्मीर मुद्दे का संयुक्त राष्ट्र में ले जाना, सत्ता पक्ष ने बार-बार इन फैसलों के लिए नेहरू की रक्षा और विदेश नीतियों को दोषी ठहराया है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 370 के संदर्भ में भी नेहरू के फैसलों को वर्तमान अस्थिरता की जड़ बताया गया है।
केंद्र सरकार ने नेहरू युग की समाजवादी नीतियों और ‘लाइसेंस-परमिट राज’ को भारत के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा माना है। बजट सत्रों के दौरान अक्सर यह तर्क दिया गया कि नेहरूवादी अर्थव्यवस्था ने निजी क्षेत्र की क्षमता को दबाकर रखा। इसके साथ ही, भाजपा ने ‘परिवारवाद’ की बहस के जरिए नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत पर लगातार प्रहार किए हैं। रक्षा आधुनिकीकरण के मुद्दे पर भी सरकार का कहना रहा है कि नेहरू काल में सेना की जरूरतों को नजरअंदाज किया गया, जिसका खामियाजा देश को लंबे समय तक भुगतना पड़ा।इस प्रकार, शशि थरूर का बयान उस बड़े वैचारिक संघर्ष को दर्शाता है जो आज भारत की राजनीति में इतिहास और वर्तमान के बीच चल रहा है।
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