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Sheikh Hasina Extradition: मोदी सरकार प्रत्यर्पण से इनकार करेगी या नियमों के तहत बड़ा कदम उठाएगी

Sheikh Hasina Extradition: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जो 2024 में हुए व्यापक विद्रोह के बाद देश छोड़कर भागने को मजबूर हुई थीं, इस समय भारत में शरणार्थी के रूप में रह रही हैं। सोमवार को उनके लिए एक और झटका तब लगा, जब बांग्लादेश इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (ICT) ने पिछले वर्ष हुए देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान कथित हिंसक कार्रवाई को लेकर उन्हें मौत की सजा सुना दी। इस फैसले ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।

Sheikh Hasina Extradition: पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां को भी सुनाई गई मौत की सजा

शेख हसीना के साथ-साथ बांग्लादेश के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी इसी मामले में फांसी की सजा दी गई है। दोनों पर आरोप है कि उनके निर्देश पर सुरक्षा बलों ने छात्र आंदोलनों को दबाने के लिए बल का अत्यधिक उपयोग किया, जिसमें कई लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हुए। अब स्थिति यह है कि बांग्लादेश ने भारत सरकार से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि हसीना और असदुज्जमां को प्रत्यर्पित कर दिया जाए।

Sheikh Hasina Extradition: क्या भारत प्रत्यर्पण से मना कर सकता है?

यह सवाल अब जोर पकड़ने लगा है कि क्या भारत शेख हसीना की जान बचा पाएगा या प्रत्यर्पण के लिए बाध्य होगा। बांग्लादेश ने अपने आग्रह में दोनों देशों के बीच मौजूद प्रत्यर्पण संधि का हवाला देते हुए कहा है कि भारत इस समझौते के तहत कानूनी रूप से बाध्य है। हालांकि भारत सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला संवेदनशील और जटिल है।

2013 की प्रत्यर्पण संधि ने बनाया कानूनी ढांचा

भारत और बांग्लादेश ने 2013 में जो प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए थे, उसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच अपराधियों का आदान–प्रदान आसान बनाना और सीमा-पार आतंकवाद को नियंत्रित करना था। 2016 में इस संधि में संशोधन कर प्रक्रियाओं को और सरल बनाया गया। इस संधि के तहत कई महत्वपूर्ण मामलों में प्रत्यर्पण हो चुके हैं—जैसे शेख मुजीबुर रहमान की हत्या में शामिल कुछ दोषियों को भारत से बांग्लादेश भेजा गया था, वहीं उल्फा नेता अनूप चेतिया को बांग्लादेश से भारत लाया गया था।

संधि के मुख्य नियम—कब किया जाता है प्रत्यर्पण

प्रत्यर्पण संधि के अनुसार किसी आरोपी को तभी वापस भेजा जाता है जब कथित अपराध दोनों देशों में दंडनीय माना जाता हो और उसके लिए कम से कम एक वर्ष की कैद की सजा निर्धारित हो। दूसरा, संधि केवल मुख्य आरोपी पर ही नहीं, बल्कि किसी अपराध को मदद या उकसाने वाले व्यक्ति पर भी लागू होती है। चूंकि ICT ने शेख हसीना पर गंभीर आरोप लगाए हैं, इसलिए तकनीकी रूप से वे इस संधि के दायरे में आती हैं।

भारत को इनकार करने का अधिकार भी मौजूद

हालांकि संधि में यह भी स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत चाहे तो प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। अनुच्छेद 6 के तहत किसी भी राजनीतिक प्रकृति के अपराध के मामले में प्रत्यर्पण को रोका जा सकता है। हालांकि हत्या, नरसंहार, आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों को ‘राजनीतिक अपराध’ की श्रेणी में नहीं रखा जाता। फिर भी, अगर भारत यह साबित कर दे कि यह मुकदमा राजनीतिक प्रतिशोध के तहत चलाया जा रहा है, तो प्रत्यर्पण रोका जा सकता है।

अनुच्छेद 7 और 8—भारत के पास कानूनी आधार मौजूद

संधि के अनुच्छेद 7 और 8 भारत को इस आधार पर अनुरोध ठुकराने का अधिकार देते हैं कि मामला भारत में पहले से विचाराधीन है या फिर प्रत्यर्पण का अनुरोध ‘दुर्भावनापूर्ण’ है। यह भी कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति को वापस भेजने पर उसके साथ अमानवीय व्यवहार होने की आशंका हो या उसे निष्पक्ष न्याय नहीं मिल पाएगा, तो भारत प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। ऐसे में भारत यह तर्क दे सकता है कि बांग्लादेश में मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता और बदले की भावना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

शेख हसीना के मामले में भारत का रुख अहम

शेख हसीना दशकों तक भारत की सबसे करीबी राजनीतिक सहयोगी मानी जाती रही हैं। उनके नेतृत्व में भारत–बांग्लादेश संबंध काफी मजबूत हुए। ऐसे में भारत के ऊपर मानवीय और राजनीतिक—दोनों तरह के दबाव हैं। अगर भारत प्रत्यर्पण को मंजूरी देता है, तो हसीना की जान खतरे में पड़ सकती है; वही इनकार करने पर द्विपक्षीय संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।

मानवीय आधार पर राहत मिल सकती है

कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि हसीना भारत में शरण लिए बैठी हैं और ICT का फैसला राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित बताया जा रहा है, इसलिए भारत मानवीय आधार पर उन्हें संरक्षण दे सकता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून भी ऐसे मामलों में हस्तक्षेप का समर्थन करता है।भारत सरकार की प्रतिक्रिया का अब सबको इंतज़ार है। यह मामला न केवल कानूनी या राजनयिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत शेख हसीना को बचाएगा या बांग्लादेश के कानूनी आग्रह को मानते हुए उन्हें वापस भेज देगा।

Read More : Sheikh Hasina की फांसी की सज़ा पर भारत का पहला आधिकारिक रिएक्शन, जानें पूरा मामला

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