Smithsonian Museum
Smithsonian Museum: सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए न्यूयॉर्क स्थित स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने भारत सरकार को तीन दुर्लभ और प्राचीन कांस्य मूर्तियां लौटाने की घोषणा की है। गहन जांच और ऐतिहासिक साक्ष्यों के शोध (Provenance Research) के बाद यह प्रमाणित हुआ है कि ये बेशकीमती मूर्तियां दशकों पहले तमिलनाडु के विभिन्न मंदिरों से अवैध रूप से चुराई गई थीं। यह निर्णय वैश्विक स्तर पर लूटी गई कलाकृतियों को उनके मूल देश वापस भेजने के बढ़ते प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लौटाई जा रही ये तीनों मूर्तियां दक्षिण भारतीय कांस्य शिल्प कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनका उपयोग प्राचीन काल में मंदिरों में पूजा-अर्चना और भव्य शोभायात्राओं के लिए किया जाता था। इन मूर्तियों में शामिल हैं:
शिव नटराज (चोल काल, लगभग 990 ईस्वी): यह ब्रह्मांडीय नृत्य की मुद्रा में भगवान शिव की मूर्ति है, जो तंजावुर के श्री भावा औषधेश्वर मंदिर से जुड़ी है।
सोमस्कंद (चोल काल, 12वीं शताब्दी): इसमें भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय को एक साथ दर्शाया गया है। यह मन्नारकुडी के अलत्तूर गांव के विश्नाथ मंदिर की धरोहर है।
संत सुंदरार और परवई (विजयनगर काल, 16वीं शताब्दी): यह प्रसिद्ध नयनार संत सुंदरार और उनकी पत्नी की प्रतिमा है, जिसे कल्लाकुरिची के वीरासोलापुरम गांव के शिव मंदिर से चुराया गया था।
म्यूजियम द्वारा जारी बयान के अनुसार, इन मूर्तियों के मूल स्थान का पता लगाने में ‘फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पॉन्डिचेरी’ के फोटो आर्काइव्स और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की भूमिका अहम रही। जांच में यह कड़वा सच सामने आया कि 1950 के दशक में इन मूर्तियों को मंदिरों से गायब कर दिया गया था। अंतरराष्ट्रीय तस्करों ने फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेकर इन्हें विदेशों में बेचा। उदाहरण के तौर पर, शिव नटराज की मूर्ति को साल 2002 में न्यूयॉर्क की एक गैलरी से खरीदा गया था, जबकि इसका असली रिकॉर्ड 1957 की तस्वीरों में तमिलनाडु के मंदिर में मिलता है।
म्यूजियम और भारत सरकार के बीच हुए समझौते के तहत एक विशेष व्यवस्था की गई है। शिव नटराज की मूर्ति को ‘लॉन्ग-टर्म लोन’ (दीर्घकालिक ऋण) के आधार पर फिलहाल म्यूजियम में ही रखा जाएगा। इसके पीछे का उद्देश्य दुनिया को इस मूर्ति की चोरी, इसकी ऐतिहासिक यात्रा और अंततः इसकी पहचान बहाली की पूरी कहानी बताना है। वहीं, सोमस्कंद और संत सुंदरार की मूर्तियों को वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से जल्द ही भारत भेजा जाएगा। दोनों पक्ष इस समझौते की अंतिम प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए निरंतर संपर्क में हैं।
यह घटना स्मिथसोनियन म्यूजियम के उस अभियान का हिस्सा है जिसमें वे अपने एशियाई कला संग्रह की नैतिक समीक्षा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कदम से न केवल भारत की खोई हुई सांस्कृतिक विरासत बहाल हो रही है, बल्कि दुनिया भर के संग्रहालयों को अपनी कलाकृतियों की शुद्धता जांचने की प्रेरणा मिल रही है। भारत के लिए यह अपनी प्राचीन अस्मिता को वापस पाने की एक बड़ी कूटनीतिक और सांस्कृतिक जीत है।
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