Sonia Gandhi Voter List Case : कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी के नाम से जुड़ा 1980 की मतदाता सूची का मामला एक बार फिर अदालत पहुंच गया है। दिल्ली की अदालत ने उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उनकी कथित मतदाता सूची में एंट्री को लेकर एफआईआर दर्ज कराने की मांग पर आगे जांच से इनकार किया गया था। अदालत ने मामले को दोबारा विचार के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत भेज दिया है।
बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने उठाए सवाल
अदालत के इस आदेश के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने सोनिया गांधी की कथित 1980 की वोटर लिस्ट एंट्री को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि शिकायत में बताए गए समय पर नागरिकता का सवाल मौजूद था, तो मतदाता सूची में नाम दर्ज होने का आधार क्या था, इसकी जांच होनी चाहिए। उनके बयान राजनीतिक प्रतिक्रिया हैं, जबकि आरोपों की न्यायिक जांच अभी पूरी नहीं हुई है।
कोर्ट ने पुराने मजिस्ट्रेट आदेश को किया रद्द
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने 21 सितंबर को मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें शिकायतकर्ता की एफआईआर संबंधी मांग को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि पुराने आदेश में फैसले के पीछे पर्याप्त कारण स्पष्ट नहीं किए गए थे। इसी वजह से मामले को नए सिरे से सुनने के लिए एसीजेएम अदालत में वापस भेजा गया है।
1980 की वोटर लिस्ट में नाम होने का आरोप
मामले की शिकायत अधिवक्ता विकास त्रिपाठी ने दायर की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की 1980 की मतदाता सूची में सोनिया गांधी का नाम दर्ज था। शिकायतकर्ता ने इस एंट्री को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि बाद में उनका नाम 1982 में हटाया गया और 1983 में दोबारा सूची में दर्ज होने की बात सामने आती है। इन दावों की पुष्टि या खंडन का अंतिम फैसला अदालत को करना है।
30 अप्रैल 1983 की नागरिकता को लेकर सवाल
शिकायत में कहा गया है कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता हासिल की थी। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने 1980 की मतदाता सूची में उनके नाम की कथित मौजूदगी पर सवाल उठाया। याचिका में यह भी पूछा गया है कि नाम दर्ज करने के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ और क्या किसी गलत या फर्जी दस्तावेज की भूमिका थी। ये सभी बातें शिकायत में लगाए गए आरोप हैं, जिन्हें अदालत ने अभी प्रमाणित नहीं किया है।
मजिस्ट्रेट के आदेश में कानूनी खामी बताई गई
विशेष न्यायाधीश ने कहा कि पहले के आदेश में शिकायत में बताए गए तथ्यों और 1980, 1982 तथा 1983 में नाम के कथित शामिल होने, हटने और दोबारा दर्ज होने के क्रम पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। अदालत ने पुराने आदेश को पर्याप्त कारणों के अभाव वाला माना और मामले पर कानून के मुताबिक दोबारा विचार करने की जरूरत बताई।
पुलिस का पक्ष और स्टेटस रिपोर्ट भी अहम
अदालत ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने संबंधित पुलिस अधिकारी की बात नहीं सुनी और पुलिस थाने से स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं मंगाई। अदालत के अनुसार, BNSS की धारा 175(3) के तहत जांच संबंधी अनुरोध पर प्रक्रिया के इन पहलुओं पर विचार जरूरी था। अब नई सुनवाई में शिकायत, पुलिस का पक्ष और उपलब्ध सामग्री को ध्यान में रखकर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाना है।
विकास त्रिपाठी ने पुराने फैसले को दी थी चुनौती
शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी, जो राउज एवेन्यू स्थित सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष बताए गए हैं, ने मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच होनी चाहिए और एफआईआर की मांग पर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए। अब अदालत ने उन्हें मामले को फिर से संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने रखने का रास्ता दिया है।
कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ आरोप साबित नहीं किए
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल्ली की अदालत ने सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही साबित नहीं माना है। अदालत ने केवल पहले मजिस्ट्रेट आदेश को रद्द कर शिकायत पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। यानी अभी यह तय नहीं हुआ है कि एफआईआर दर्ज होगी या आरोपों की जांच किस तरीके से आगे बढ़ेगी।
29 सितंबर को फिर होगी मामले की सुनवाई
अब मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को एसीजेएम अदालत में होगी। इस दौरान शिकायतकर्ता और पुलिस का पक्ष सामने आ सकता है। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर आगे जांच या एफआईआर की जरूरत है या नहीं। फिलहाल मामला न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच चुका है और आरोपों की अंतिम कानूनी स्थिति अगली सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगी।
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