South American Lungfish : दुनिया की सबसे ज्यादा DNA वाली मछली का नया रिकॉर्ड साउथ अमेरिकन लंगफिश (Lepidosiren paradoxa) ने अपने नाम कर लिया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस मछली के जीनोम में लगभग 91 अरब DNA बेस मौजूद हैं। यह संख्या इंसानों के जीनोम में पाए जाने वाले करीब 3 अरब DNA बेस से लगभग 30 गुना ज्यादा है। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी जीव में DNA की मात्रा ज्यादा होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह जीव इंसानों की तुलना में ज्यादा विकसित या जटिल है।
मछली के जीनोम में करीब 91 अरब DNA बेस
वैज्ञानिक जीनोम को DNA के उन सभी हिस्सों के समूह के रूप में समझते हैं, जिनमें किसी जीव से जुड़ी आनुवंशिक जानकारी मौजूद होती है। साइंटिफिक जर्नल Science में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, साउथ अमेरिकन लंगफिश के जीनोम में करीब 91 अरब DNA बेस यानी A, T, G और C मौजूद हैं। इसके मुकाबले इंसानी जीनोम में लगभग 3 अरब बेस पाए जाते हैं। इतनी बड़ी मात्रा के बावजूद दोनों प्रजातियों में जीन की संख्या में बहुत बड़ा अंतर नहीं है।
जीन की संख्या इंसानों के करीब ही
लंगफिश का जीनोम आकार में इंसानों के जीनोम से लगभग 30 गुना बड़ा है, लेकिन इसमें जीन की संख्या करीब 20 हजार बताई गई है। यानी विशाल जीनोम का बड़ा हिस्सा अतिरिक्त जीन से नहीं बना है। वैज्ञानिकों के लिए यही बात इस खोज को और दिलचस्प बनाती है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि जीनोम का आकार और किसी जीव की जैविक जटिलता हमेशा एक-दूसरे के समानुपाती नहीं होते।
90 प्रतिशत DNA रिपिटिटिव हिस्सों से बना
रिसर्च के अनुसार, साउथ अमेरिकन लंगफिश के जीनोम का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा रिपिटिटिव DNA से बना हुआ है। इन हिस्सों को ट्रांसपोजेबल एलिमेंट्स कहा जाता है। ये DNA के ऐसे हिस्से होते हैं जो अपनी प्रतियां बनाने और जीनोम के दूसरे स्थानों पर पहुंचने की क्षमता रखते हैं। इस तरह के रिपिटिटिव हिस्से समय के साथ किसी जीव के जीनोम के आकार को काफी बड़ा कर सकते हैं।
इंसानी जीनोम में भी मौजूद हैं रिपिटिटिव हिस्से
रिपिटिटिव DNA केवल लंगफिश में ही नहीं पाया जाता। इंसानी जीनोम का भी करीब 40 प्रतिशत हिस्सा ऐसे रिपिटिटिव तत्वों से बना माना जाता है। हालांकि, लंगफिश में इनकी मात्रा असाधारण रूप से ज्यादा है। वैज्ञानिकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये DNA तत्व किस तरह जीनोम के विकास और उसके आकार को प्रभावित करते हैं तथा लंबे समय में किसी प्रजाति की आनुवंशिक संरचना में क्या बदलाव ला सकते हैं।
कुछ जीन की कमी से बढ़ता गया जीनोम
रिसर्च में यह संकेत मिला है कि साउथ अमेरिका और अफ्रीका की लंगफिश में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण जीन नहीं पाए जाते, जो सामान्य तौर पर रिपिटिटिव DNA के फैलाव को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस नियंत्रण की कमी के कारण रिपिटिटिव DNA समय के साथ लगातार बढ़ता गया। इसी प्रक्रिया ने लंगफिश के जीनोम को असाधारण रूप से विशाल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो सकती है।
लंगफिश को क्यों कहा जाता है लिविंग फॉसिल?
लंगफिश को अक्सर ‘लिविंग फॉसिल’ कहा जाता है, क्योंकि इसकी विकासवादी विशेषताएं बेहद प्राचीन मछलियों से जुड़ी हुई हैं। साउथ अमेरिकन लंगफिश पानी में रहने के साथ-साथ हवा से भी ऑक्सीजन ले सकती है। यही विशेषता इसे विकासवादी अध्ययन के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। वैज्ञानिक इसके जीनोम का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मछलियों में समय के साथ सांस लेने और अन्य महत्वपूर्ण जैविक क्षमताओं का विकास कैसे हुआ।
विशाल DNA की कीमत भी चुकानी पड़ सकती है
वैज्ञानिकों का मानना है कि इतना बड़ा जीनोम अपने साथ कुछ जैविक चुनौतियां भी ला सकता है। ज्यादा DNA की वजह से कोशिका का न्यूक्लियस बड़ा हो सकता है। इसके अलावा इतनी बड़ी मात्रा में DNA की प्रतियां तैयार करने के लिए कोशिकाओं को अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ सकती है। इसलिए विशाल जीनोम केवल एक आनुवंशिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जीव के लिए ऊर्जा और कोशिकीय स्तर पर अतिरिक्त बोझ भी हो सकता है।
विकासवाद समझने में मिलेगी नई जानकारी
साउथ अमेरिकन लंगफिश की यह खोज केवल DNA की मात्रा का नया रिकॉर्ड बनाने तक सीमित नहीं है। इसका जीनोम वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर सकता है कि जीनोम कैसे विकसित और बड़ा होते हैं। साथ ही, यह खोज मछलियों के विकास, आनुवंशिक बदलाव और पृथ्वी पर जीवन की जटिल विकासवादी यात्रा को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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