Bihar SIR process: बिहार में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि अगर याचिकाकर्ता यह साबित कर देते हैं कि यह प्रक्रिया अवैध है, तो कोर्ट SIR पर रोक लगाने में देर नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों को लेकर बेहद अहम मानी जा रही है।

क्या है मामला?
SIR प्रक्रिया के तहत वर्ष 2003 की मतदाता सूची में दर्ज 5 करोड़ वोटर्स की दोबारा जांच की जा रही है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए गरीब, प्रवासी और कमजोर वर्गों के वोटरों को जानबूझकर सूची से बाहर किया जा रहा है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा, “अगर यह प्रक्रिया अवैध साबित हुई तो हम इसे तुरंत रोक देंगे। किसी को यह शिकायत करने का मौका नहीं मिलेगा कि उसकी बात नहीं सुनी गई।”
याचिकाकर्ताओं की आपत्तियाँ
याचिका दाखिल करने वालों में कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल, सांसद मनोज झा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, सांसद महुआ मोइत्रा, वकील अश्विनी उपाध्याय, PUCL, एडीआर और नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन वूमेन शामिल हैं।
सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में कहा, “क्या 2003 में वोटर लिस्ट में रहे 5 करोड़ लोगों की फिर से जांच जायज है? वह भी कुछ ही महीनों में?”
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया, “अगर आप साबित कर देते हैं कि प्रक्रिया असंवैधानिक है, तो हम कार्रवाई करने को तैयार हैं।”
योगेंद्र यादव का तर्क: गरीब होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित
योगेंद्र यादव ने दलील दी कि “दुनियाभर में जहां नागरिकों को खुद को वोटर साबित करना पड़ता है, वहां सबसे ज़्यादा गरीब और वंचित लोग सूची से बाहर होते हैं। बिहार में भी यही हो रहा है।” उन्होंने यह भी बताया कि महिलाओं के नाम स्थानांतरित बता कर हटाए जा रहे हैं, जबकि पलायन तो पुरुषों का ज्यादा होता है।
योगेंद्र यादव ने कोर्ट में ऐसे दो लोगों को पेश किया जिन्हें ड्राफ्ट लिस्ट में मृत घोषित कर दिया गया है। उन्होंने पूछा, “अगर किसी को 25 सितंबर को बताया जाए कि उसका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है, तो वो चुनाव कैसे लड़ेगा?” यह तो चुनावी मुकाबले से लोगों को हटाने का आसान तरीका है।
चुनाव आयोग की सफाई
चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि “यह मुद्दा कोर्ट में नहीं, टीवी स्टूडियो में उठाया जा रहा है। ड्राफ्ट लिस्ट का मतलब फाइनल नहीं होता। अगर किसी का नाम छूटा है, तो वह फाइनल लिस्ट में जोड़ा जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि ड्राफ्ट लिस्ट में नाम छूटना अंतिम नहीं होता, लेकिन साथ ही संकेत दिया कि अगर बड़े स्तर पर गड़बड़ी पाई गई, तो न्यायिक हस्तक्षेप तय है।
लोकतंत्र के मूल अधिकार की रक्षा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती यह दर्शाती है कि वोट का अधिकार भारत के लोकतंत्र की आत्मा है, और इससे किसी भी नागरिक को वंचित नहीं किया जा सकता। सितंबर में अगली सुनवाई में अगर याचिकाकर्ता ठोस सबूत पेश करते हैं, तो यह प्रक्रिया बंद भी की जा सकती है।
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