Supreme Court
Supreme Court: भारत की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर पशु अधिकारों और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर दी जाने वाली पशु बलि की प्रथा पर रोक लगाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने इस गंभीर विषय पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उनका आधिकारिक पक्ष जानना चाहा है।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इस याचिका पर प्रारंभिक विचार करने के बाद केंद्र सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने विशेष रूप से केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत यह समझना चाहती है कि वर्तमान आधुनिक समाज में इस प्राचीन प्रथा की वैधानिक और नैतिक स्थिति क्या है। इस नोटिस के बाद अब केंद्र सरकार को यह तय करना होगा कि वह धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और पशु क्रूरता निवारण के बीच किस तरह का संतुलन बिठाती है।
इस पूरी कानूनी लड़ाई के केंद्र में ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960’ (Prevention of Cruelty to Animals Act) की एक विशेष धारा है। याचिकाकर्ता ने अधिनियम की धारा 28 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। उल्लेखनीय है कि जहां यह पूरा कानून पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने और उन्हें संरक्षण देने की बात करता है, वहीं इसकी धारा 28 एक अपवाद (Exception) प्रदान करती है। यह धारा स्पष्ट करती है कि किसी भी समुदाय के धर्म की परंपराओं के अनुसार किसी जानवर को मारना अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। याचिका में इसी विरोधाभास को खत्म करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि ‘धर्म के नाम पर बलि’ देना न केवल पशुओं के प्रति घोर क्रूरता है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 51A(g) का भी उल्लंघन है, जो नागरिकों को सभी जीवित प्राणियों के प्रति दयाभाव रखने का मौलिक कर्तव्य याद दिलाता है। याचिका में दलील दी गई है कि किसी भी सभ्य समाज में रक्तपात और हत्या को धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि बलि को वैध ठहराने वाले कानूनों को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए ताकि बेजुबान जानवरों को क्रूरता से बचाया जा सके।
मंदिरों में बलि प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट का यह रुख काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत के कई राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, केरल और त्रिपुरा की उच्च न्यायालयों ने पूर्व में अपने स्तर पर पशु बलि पर प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए हैं, जिन्हें अक्सर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाती रही है। अब जब मामला सीधे ‘धारा 28’ की वैधता पर आ गया है, तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरे देश के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या न्यायालय इस प्रथा को धार्मिक स्वतंत्रता का अभिन्न अंग मानता है या इसे एक सामाजिक बुराई मानकर प्रतिबंधित करता है।
अदालत ने केंद्र को जवाब देने के लिए एक महीने का समय दिया है। इस अवधि के दौरान सरकार को विभिन्न हितधारकों और धार्मिक समूहों के साथ-साथ पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के तर्कों का विश्लेषण करना होगा। अगली सुनवाई में जब केंद्र अपना हलफनामा पेश करेगा, तब इस बात की दिशा स्पष्ट होगी कि भारत में मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में पशुओं की बलि का भविष्य क्या होगा। फिलहाल, इस नोटिस ने पशु अधिकार संगठनों के बीच एक नई उम्मीद जगा दी है।
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