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Freebies Culture: रेवड़ी कल्चर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, क्या मुफ्त योजनाएं बन रही हैं भारत की आर्थिक प्रगति में रोड़ा?

Freebies Culture: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में ‘फ्रीबीज’ (मुफ्त सुविधाओं) के बढ़ते चलन पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम बनाम केंद्र सरकार के मामले की सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट किया कि लोकलुभावन वादे देश की बुनियादी आर्थिक संरचना को खोखला कर रहे हैं। अदालत का मानना है कि राज्यों की वित्तीय स्थिति पहले से ही नाजुक है, और ऐसे में बिना किसी ठोस योजना के मुफ्त सेवाएं बांटना आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट पैदा कर सकता है।

CJI की टिप्पणी: राज्यों का बढ़ता राजस्व घाटा और फिजूलखर्ची

मुख्य न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा कि देश के अधिकांश राज्य वर्तमान में भारी राजस्व घाटे (Revenue Deficit) से जूझ रहे हैं। इसके बावजूद, सरकारें मुफ्त भोजन, साइकिल, बिजली और अब सीधे नकद हस्तांतरण जैसी योजनाओं को प्राथमिकता दे रही हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि राज्य का खजाना खाली है, तो इन योजनाओं के लिए धन कहाँ से आ रहा है? CJI ने जोर देकर कहा कि अगर सुबह से ही मुफ्त की रेवड़ियां बांटना शुरू कर दिया जाएगा, तो सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों जैसे आवश्यक बुनियादी ढांचों के विकास के लिए पैसा कहाँ से बचेगा?

विकास बनाम लोकलुभावनवाद: 25 प्रतिशत का मानक

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आर्थिक मानक का सुझाव देते हुए कहा कि किसी भी राज्य को अपने वार्षिक राजस्व का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा अनिवार्य रूप से विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। वर्तमान में, कई राज्य अपनी आय का बड़ा हिस्सा सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं में खर्च कर रहे हैं, जिससे दीर्घकालिक निवेश (Capital Expenditure) के लिए धन की कमी हो रही है। अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे हलफनामा दायर कर बताएं कि इन खर्चों की भरपाई कैसे की जाएगी।

चुनावी राजनीति और करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात को रेखांकित किया कि ‘फ्रीबीज’ की घोषणाएं अक्सर चुनावों से ठीक पहले की जाती हैं, जो कि राजनीतिक लाभ लेने का एक माध्यम बन गई हैं। उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि यह सारा पैसा आम जनता और ईमानदार करदाताओं (Taxpayers) की जेब से आता है। जब सरकारें मुफ्त सुविधाएं देती हैं, तो अंततः इसका बोझ जनता पर ही बढ़ते कर्ज या बढ़ी हुई महंगाई के रूप में पड़ता है। कोर्ट ने राजनीतिक दलों और समाजशास्त्रियों को इस प्रवृत्ति पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की सलाह दी है।

मुफ्त बिजली और लक्षित सब्सिडी की आवश्यकता

सुनवाई के दौरान एक उदाहरण देते हुए अदालत ने कहा कि कुछ राज्यों में संपन्न जमींदारों को भी मुफ्त बिजली दी जा रही है, जबकि वे भुगतान करने में सक्षम हैं। यह संसाधनों का गलत आवंटन है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि सब्सिडी केवल उन्हीं को मिलनी चाहिए जिन्हें इसकी वास्तविक आवश्यकता है। बिना किसी भेदभाव के सभी को मुफ्त सुविधाएं देना आर्थिक दृष्टि से “आत्मघाती” कदम हो सकता है।

आर्थिक अनुशासन की पुकार

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है। यह केवल राजनीति का विषय नहीं है, बल्कि देश के आर्थिक स्वास्थ्य का सवाल है। यदि राज्यों ने समय रहते अपने खर्चों पर लगाम नहीं लगाई और वित्तीय अनुशासन का पालन नहीं किया, तो भविष्य में गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। अब समय आ गया है कि ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) और ‘आर्थिक दिवालियापन’ के बीच की सूक्ष्म रेखा को समझा जाए।

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