Private Hospitals : प्राइवेट और कॉरपोरेट अस्पतालों में दवाओं की कीमतों में कथित भारी अंतर और मरीजों से होने वाली वसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। मंगलवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए निजी अस्पतालों में दवाओं की कीमत और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कुछ कॉरपोरेट अस्पताल सेवा संस्थानों के बजाय उद्योग की तरह काम करते दिखाई दे रहे हैं।
करीब 3 हजार की दवा का MRP 27 हजार क्यों?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की एक दवा की कीमत का उदाहरण सामने रखा। अदालत ने पिछले सप्ताह बताया था कि जिस दवा का प्राइस टू रिटेलर यानी PTR करीब 2,700 रुपये है, उसका अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP करीब 27 हजार रुपये निर्धारित है। कीमतों में इस बड़े अंतर को लेकर अदालत ने सवाल उठाया। मंगलवार को भी पीठ ने इसी उदाहरण के जरिए दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था पर चिंता जताई।
अस्पताल की फार्मेसी से दवा खरीदने पर सवाल
पीठ ने सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठाया कि कई कॉरपोरेट अस्पताल मरीजों को अपनी फार्मेसी या संबंधित केमिस्ट से दवाएं खरीदने के लिए कहते हैं। अदालत के समक्ष यह बात रखी गई कि यदि कोई मरीज बाहर से दवा खरीदकर अस्पताल पहुंचता है, तो कुछ परिस्थितियों में अस्पताल इलाज की गारंटी से इनकार कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव को लेकर सवाल किए।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में टैक्सपेयर्स के पैसे का मुद्दा
अदालत ने दवाओं की कीमत के मामले को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से भी जोड़ा। पीठ ने सवाल किया कि यदि सरकारी योजना के तहत इलाज करा रहे मरीज की 27 हजार रुपये वाली दवा का भुगतान सरकार करती है, जबकि उसकी कीमत करीब 3 हजार रुपये के आसपास है, तो अतिरिक्त राशि का बोझ आखिर किस पर पड़ता है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में सार्वजनिक धन यानी टैक्सपेयर्स के पैसे का इस्तेमाल होता है।
दवाओं के मार्जिन पर समान नियम की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि दवाओं की कीमत और अस्पतालों के मार्जिन को लेकर एक समान व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती। पीठ ने केंद्र सरकार से दवा की लागत, अधिकतम खुदरा मूल्य और अस्पतालों द्वारा लिए जाने वाले मार्जिन के बीच संतुलन पर विचार करने को कहा। अदालत ने यह भी पूछा कि मरीजों को उचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती।
जरूरी और गैर-अनुसूचित दवाओं पर सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जरूरी दवाओं और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच कीमत नियंत्रण के अंतर पर भी सवाल उठाया। पीठ ने केंद्र से पूछा कि क्या सभी दवाओं के अधिकतम मूल्य पर 16 प्रतिशत तक मार्जिन की सीमा तय करने पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने सरकार को इस पूरे नियामकीय ढांचे पर विचार करने के लिए कहा।
कीमतों में अंतर से मरीजों के भरोसे पर असर
पीठ ने दवाओं की कीमतों में बहुत अधिक अंतर से पैदा होने वाली दूसरी समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने कहा कि यदि किसी दवा का प्रिंटेड MRP 27 हजार रुपये है और कोई ईमानदार केमिस्ट उसे करीब 3 हजार रुपये में देने की पेशकश करता है, तो मरीज को दवा की प्रामाणिकता पर संदेह हो सकता है। इससे मरीजों के बीच भरोसे का संकट पैदा हो सकता है।
केंद्र ने संतुलित समाधान तलाशने की बात कही
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस समस्या का समाधान तलाशने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाते हुए उचित रास्ता निकालना होगा। इस विषय पर संबंधित अधिकारियों के साथ चर्चा के बाद सरकार अपना जवाब देगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को विचार-विमर्श के लिए अतिरिक्त समय दिया है।
12 अक्टूबर को होगी मामले की अगली सुनवाई
दवाओं की कीमतों से जुड़े इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट किशन चंद जैन की याचिका पर कर रहा है। याचिका में जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य करने, गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर शुरुआती स्तर से नियंत्रण और मेडिकल डिवाइस की अधिकतम खुदरा कीमत निर्धारित करने जैसी मांगें की गई हैं। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
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