Loan Guarantor
Loan Guarantor: अक्सर लोग दोस्ती या रिश्तेदारी निभाने के चक्कर में किसी के लोन का गारंटर बन जाते हैं। इसे अक्सर एक साधारण कागजी औपचारिकता माना जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि लोन गारंटर की जिम्मेदारी कर्ज लेने वाले मुख्य व्यक्ति (Principal Borrower) के बराबर ही होती है। इसका मतलब यह है कि यदि मुख्य उधारकर्ता पैसा नहीं लौटाता, तो बैंक गारंटर को भी समान रूप से उत्तरदायी मानकर कानूनी शिकंजा कस सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (26 फरवरी) को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के ‘विष्णु कुमार अग्रवाल बनाम पीरामल एंटरप्राइजेज’ मामले के उस पुराने फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एक ही कर्ज के लिए दो अलग-अलग पक्षकारों के खिलाफ एक साथ याचिका दायर नहीं की जा सकती। पुराने नियम के तहत इसे “एक ही गलती की दो सजा” माना जाता था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) 2016 के तहत मुख्य उधारकर्ता और कॉर्पोरेट गारंटर दोनों के खिलाफ एक साथ CIRP (Corporate Insolvency Resolution Process) शुरू करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।
इस फैसले से बैंकों और वित्तीय संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। पहले की स्थिति में, यदि एक कर्ज के लिए दो लोगों ने गारंटी दी थी, तो बैंक को एक-एक करके उनके खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ती थी, जिसमें वर्षों लग जाते थे। अब बैंक डिफॉल्ट होने की स्थिति में एक ही दिन में मुख्य उधारकर्ता, पहले गारंटर और दूसरे गारंटर—तीनों के खिलाफ एक साथ मामला दर्ज कर सकता है। कोर्ट का मानना है कि जब तक बैंक को उसके हिस्से का पूरा पैसा नहीं मिल जाता, उसे हर उस व्यक्ति से वसूली का अधिकार है जिसने भुगतान की गारंटी दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले का आधार भारतीय अनुबंध अधिनियम (Indian Contract Act) की धारा 128 को बनाया है। यह धारा कहती है कि गारंटर की देयता मुख्य उधारकर्ता के साथ ‘सह-विस्तृत’ (Co-extensive) होती है। सरल शब्दों में कहें तो, जितनी जिम्मेदारी कर्ज लेने वाले की है, उतनी ही गारंटर की भी है। बैंक के पास यह विकल्प है कि वह मुख्य कर्जदार से पहले सीधे गारंटर की संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू कर दे। अब गारंटर यह कहकर नहीं बच सकता कि पहले उधारकर्ता की संपत्ति बेची जाए और फिर उससे वसूली की जाए।
अब तक कई कंपनियों के प्रमोटर यह सोचकर निश्चिंत रहते थे कि जब तक कंपनी का दिवाला मामला सुलझ नहीं जाता, उनकी निजी संपत्ति सुरक्षित है। लेकिन अब नए नियमों के तहत, यदि कंपनी बिकने के बाद भी बैंक का पूरा कर्ज वसूल नहीं होता है, तो बैंक शेष राशि के लिए सीधे प्रमोटर या गारंटर के घर का दरवाजा खटखटा सकता है। बैंक अब आपके फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), बैंक बैलेंस, म्यूचुअल फंड निवेश और यहाँ तक कि कमर्शियल प्रॉपर्टी को भी कुर्क करके अपने नुकसान की भरपाई कर सकता है।
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