Supreme Court Pocket Money Case : सुप्रीम कोर्ट में वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी की पॉकेट मनी की मांग पर दिलचस्प बहस देखने को मिली। एक महिला ने अपने पति से हर महीने 1,500 डॉलर यानी करीब 1 लाख 41 हजार रुपये अलग से पॉकेट मनी देने की मांग की थी। इस मांग पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज ने मजाकिया अंदाज में ऐसी टिप्पणी की, जिसने अदालत में मौजूद लोगों का ध्यान खींच लिया। जज ने अपनी सैलरी का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारी सैलरी करीब 3 लाख रुपये है, 15 हजार डॉलर नहीं। उन्होंने महिला के वकील से कहा कि कृपया महिलाओं को ऐसे शानदार आइडिया मत दीजिए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन ने की सुनवाई
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, 4 नवंबर को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ इस वैवाहिक विवाद पर सुनवाई कर रही थी। मामले में महिला की ओर से पति से 1,500 डॉलर की अतिरिक्त पॉकेट मनी देने की मांग उठाई गई थी। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने सवाल किया कि जब पति पत्नी की सभी आवश्यकताएं और मांगें पूरी कर रहा है, तो अलग से इतनी बड़ी पॉकेट मनी देने की जरूरत क्यों है? जज ने इस तरह की मांग को लेकर हल्के-फुल्के अंदाज में अपनी चिंता भी जाहिर की।

जज ने अपनी सैलरी का उदाहरण देकर किया मजाक
सुनवाई के दौरान जज ने महिला के वकील से मजाकिया लहजे में कहा कि अगर इस तरह की मांगों को प्रोत्साहित किया गया, तो भविष्य में उनकी पत्नियां भी उनसे इसी तरह पैसों की मांग कर सकती हैं। उन्होंने अपनी सैलरी का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधीशों को लगभग 3 लाख रुपये मिलते हैं, न कि 15 हजार डॉलर। उनकी इस टिप्पणी ने वैवाहिक विवाद से जुड़ी सुनवाई को दिलचस्प बना दिया। हालांकि, यह टिप्पणी मामले में पॉकेट मनी की मांग पर कोई सामान्य कानूनी नियम या अंतिम फैसला नहीं है।

विदेशी अदालत से मिला तलाक भारत में अपने आप मान्य नहीं
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य वैवाहिक विवाद में विदेश की अदालत से मिले तलाक के आदेश की कानूनी मान्यता को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि विदेश में तलाक मिल जाने भर से वह भारत में स्वतः वैध नहीं हो जाता। खासतौर पर केवल इस आधार पर तलाक को मान्यता नहीं दी जा सकती कि पति-पत्नी के रिश्ते में सुधार की कोई संभावना नहीं बची है। अदालत ने संबंधित मामले में पति की याचिका खारिज कर दी।
दूसरी शादी और द्विविवाह के मामले में क्या कहा अदालत ने?
सुप्रीम कोर्ट ने द्विविवाह से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी महत्वपूर्ण बात कही। अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों की जांच में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि दूसरी शादी कहां हुई थी। पहली शादी की कानूनी स्थिति और दूसरी शादी के समय उसके अस्तित्व में होने जैसे पहलुओं पर भी विचार करना आवश्यक है। यानी द्विविवाह के आरोप की जांच करते समय दोनों विवाहों से जुड़े कानूनी तथ्यों को ध्यान में रखना होगा।

भारत में किन कानूनों के तहत सुलझते हैं वैवाहिक विवाद?
भारत में विवाह और पारिवारिक विवादों के निपटारे के लिए अलग-अलग कानून मौजूद हैं। इनमें तलाक, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, बच्चों की कस्टडी, संपत्ति विवाद और दूसरी शादी जैसे मामले शामिल हैं। विवाद की प्रकृति के अनुसार पति या पत्नी फैमिली कोर्ट, मजिस्ट्रेट, पुलिस अथवा कानूनी सेवा प्राधिकरण की मदद ले सकते हैं।
धर्म और विवाह की प्रक्रिया के अनुसार लागू होते हैं कानून
भारत में विवाह पर लागू कानून संबंधित पक्षों के धर्म और विवाह की कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर कर सकते हैं। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदायों के विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं, अन्य समुदायों के लिए अलग-अलग वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने एक बार फिर वैवाहिक अधिकारों और कानूनी जिम्मेदारियों पर चर्चा तेज कर दी है।

