Swami Avimukteshwaranand Case : ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के विरुद्ध रचे गए एक कथित षड्यंत्र का मामला अब न्यायपालिका की दहलीज पर है। शंकराचार्य पर झूठा यौन शोषण का आरोप लगाने के लिए दबाव डाले जाने और धमकी मिलने से संबंधित एक याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर की एकल पीठ ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर याचिका पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करें। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने शंकराचार्य पर आरोप लगाने वाले आशुतोष ब्रह्मचारी को भी इस मामले में पक्षकार बनाने का आदेश दिया है। अब इस पूरे प्रकरण की अगली सुनवाई 16 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है।

पत्रकार को मिला था प्रलोभन और मिली जान से मारने की धमकी
यह याचिका शाहजहांपुर के निवासी पत्रकार रमाशंकर दीक्षित द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि 18 फरवरी 2026 को तीन अज्ञात व्यक्तियों ने उनसे संपर्क किया और उन्हें भारी धन का प्रलोभन दिया। इन अज्ञात लोगों का उद्देश्य पत्रकार को इस बात के लिए राजी करना था कि वे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के विरुद्ध उनकी दो नाबालिग पुत्रियों के यौन शोषण का झूठा आरोप लगाएं। रमाशंकर दीक्षित का दावा है कि जब उन्होंने इस अनैतिक और घृणित प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया, तो उन्हें और उनके पूरे परिवार को जान से मारने की धमकियां मिलनी शुरू हो गईं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उनके घर की रेकी भी कराई गई।

पुलिस सुरक्षा के बीच भी बढ़ा दबाव, अब न्याय की गुहार
याचिका में एक बेहद गंभीर आरोप पुलिसकर्मियों पर भी लगाया गया है। रमाशंकर दीक्षित के अनुसार, जब उन्होंने इन धमकियों की शिकायत प्रशासन से की, तो सुरक्षा के लिए कुछ पुलिसकर्मियों को तैनात तो किया गया, लेकिन उन सुरक्षाकर्मियों पर भी आरोप है कि उन्होंने याचिकाकर्ता पर अपना बयान बदलने और आरोपों के समर्थन में जाने का दबाव बनाया। पत्रकार का कहना है कि उन्होंने जिले के तमाम प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। दो नाबालिग बेटियों के पिता होने के नाते, वे अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गहरे संकट में हैं।
हाईकोर्ट से मिली सुरक्षा की उम्मीद, आगे की कार्रवाई पर नजर
अधिवक्ता डॉ. गजेन्द्र सिंह यादव के माध्यम से दायर इस याचिका में परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने और आवश्यक विधिक संरक्षण प्रदान करने की मांग की गई है। कोर्ट ने इस मामले को ‘फ्रेश केस’ के रूप में सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है, जिससे यह स्पष्ट है कि न्यायपालिका इस गंभीर षड्यंत्र को लेकर काफी सतर्क है। शंकराचार्य जैसे आध्यात्मिक व्यक्तित्व को बदनाम करने की इस कथित साजिश और एक पत्रकार को डराने-धमकाने के इस मामले ने पूरे प्रदेश में चर्चाओं को जन्म दे दिया है। अब सभी की निगाहें 16 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां उत्तर प्रदेश सरकार की रिपोर्ट इस मामले का भविष्य तय करेगी।
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