UP Politics 2026
UP Politics 2026: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में अभी लगभग एक वर्ष का समय शेष है, लेकिन राजनीतिक अखाड़े में शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। गठबंधन टूटने और नई पार्टियाँ बनने के दौर के बीच, राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी (RSSP) के मुखिया स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने पूर्व सहयोगी अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मौर्य, जो कभी समाजवादी पार्टी के मुख्य रणनीतिकारों में से एक थे, अब अखिलेश के सबसे बड़े आलोचकों में शुमार हो गए हैं। उनके हालिया बयानों ने राज्य की सियासत में गर्मी बढ़ा दी है।
लखीमपुर खीरी में संत रविदास जयंती के पावन अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में स्वामी प्रसाद मौर्य मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। मंच से जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने समाजवादी पार्टी के बहुचर्चित ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की धज्जियाँ उड़ाईं। मौर्य ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव अपनी राजनीतिक सुविधा और स्वार्थ के अनुसार इस फॉर्मूले की परिभाषा बदलते रहते हैं। इसी दौरान उन्होंने अखिलेश की पत्नी और सांसद डिंपल यादव का नाम लेकर एक ऐसी टिप्पणी की, जिसने विवाद खड़ा कर दिया है।
मौर्य ने कटाक्ष करते हुए कहा कि अखिलेश का PDA स्थिर नहीं है। उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा, “कभी ‘P’ का मतलब पिछड़ी जातियां होता है, तो चुनाव आते ही वह पंडित बन जाता है। इसी तरह ‘A’ का मतलब कभी अल्पसंख्यक होता है, तो कभी अगड़ी जातियां।” सबसे तीखा हमला उन्होंने ‘D’ अक्षर पर किया। मौर्य ने कहा, “कभी ‘D’ का मतलब दलित होता है, लेकिन जब सत्ता और परिवार की बात आती है, तो वही ‘D’ डिंपल यादव बन जाता है।” मौर्य का इशारा इस ओर था कि सपा में दलितों और पिछड़ों के हक से ज्यादा परिवारवाद को प्राथमिकता दी जाती है।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने PDA को जनता को गुमराह करने वाला एक ‘चुनावी धोखा’ करार दिया। उन्होंने कहा कि शोषितों और वंचितों के नाम पर केवल वोट बैंक की राजनीति की जा रही है। मौर्य की इस टिप्पणी के बाद समाजवादी पार्टी के खेमे में भारी आक्रोश है। पार्टी कार्यकर्ताओं और कई दिग्गज नेताओं ने इसे महिलाओं का अपमान और राजनीति का गिरता हुआ स्तर बताया है। समर्थकों का तर्क है कि वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन किसी महिला नेता को व्यक्तिगत राजनीति में घसीटना मौर्य की हताशा को दर्शाता है।
हालांकि इस बयान पर फिलहाल अखिलेश यादव या डिंपल यादव की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया पर स्वामी प्रसाद मौर्य के खिलाफ ट्रेंड शुरू हो गए हैं। विपक्षी दलों का भी मानना है कि सार्वजनिक मंचों से संयम बरतना चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले भारतीय जनता पार्टी भी PDA की परिभाषा को लेकर अखिलेश यादव को घेरती रही है, और अब स्वामी प्रसाद मौर्य के सुर भी उसी दिशा में जाते दिख रहे हैं। उत्तर प्रदेश की आगामी चुनावी लड़ाई अब केवल विकास पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत छींटाकशी और जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही है।
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