Tamil Nadu Politics
Tamil Nadu Politics: चुनावी सरगर्मी के बीच मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन और सत्तारूढ़ DMK पार्टी को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म पर दिए गए विवादास्पद बयान को स्पष्ट रूप से ‘हेट स्पीच’ (नफरत फैलाने वाला भाषण) करार दिया है। कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के भड़काऊ बयानों से सनातन धर्म का पालन करने वाले करोड़ों लोगों की सुरक्षा और उनकी धार्मिक भावनाओं को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। यह फैसला न केवल उदयनिधि के लिए, बल्कि पूरी DMK सरकार के लिए एक बड़ा नैतिक और कानूनी झटका माना जा रहा है।
इस पूरे विवाद की जड़ 2023 के उस भाषण में है जहाँ उदयनिधि ने सनातन की तुलना बीमारियों से की थी। इस पर भाजपा नेता अमित मालवीय ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी, जिसके बाद उनके खिलाफ तमिलनाडु में मामला दर्ज किया गया था। न्यायमूर्ति एस. श्रीमति की पीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए अमित मालवीय के खिलाफ दर्ज एफआईआर को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि मालवीय ने केवल एक पीड़ित और सनातनी के रूप में अपनी आस्था का बचाव किया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि मालवीय के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा और इससे उन्हें अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने उदयनिधि के भाषण का विश्लेषण करते हुए निष्कर्ष निकाला कि उनका संबोधन सीधे तौर पर देश की 80% हिंदू आबादी के खिलाफ था। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि मंत्री के भाषण से ‘नरसंहार’ (Genocide) जैसा भयावह अर्थ निकलता है। कोर्ट ने इस बात पर भी आश्चर्य और दुख व्यक्त किया कि नफरत फैलाने वाला भाषण देने वाले मंत्री के खिलाफ तो कोई ठोस मामला दर्ज नहीं किया गया, लेकिन उस भाषण पर प्रतिक्रिया देने वाले व्यक्ति के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई की गई। अदालत ने इसे न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया।
यह पूरा विवाद सितंबर 2023 में तब शुरू हुआ जब उदयनिधि स्टालिन ने ‘तमिलनाडु प्रोग्रेसिव राइटर्स आर्टिस्ट एसोसिएशन’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का नाम ही ‘सनातन उन्मूलन सम्मेलन’ रखा गया था। यहाँ भाषण देते हुए मंत्री ने सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू’, ‘मलेरिया’ और ‘कोरोना’ से की थी और कहा था कि इसे केवल रोकना नहीं, बल्कि पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए। इसी बयान के बाद देश भर में उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए और सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुँचा।
अमित मालवीय पर आरोप था कि उन्होंने वीडियो को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जिससे ऐसा लगा कि उदयनिधि 80% हिंदुओं के कत्लेआम की बात कर रहे हैं। DMK की एडवोकेट विंग ने उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 153A और 505 के तहत मामला दर्ज कराया था। मालवीय के वकीलों ने तर्क दिया कि उन्होंने केवल सार्वजनिक डोमेन में मौजूद वीडियो पर अपनी समझ व्यक्त की थी। अभियोजन पक्ष ने इसे ‘फर्जी सूचना’ बताया, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि से मंत्री आते हैं, वहाँ सनातन धर्म पर लगातार हमले होते रहे हैं, ऐसे में मालवीय की व्याख्या को निराधार नहीं कहा जा सकता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य में हिंदू धर्म के प्रतीकों के अपमान की पिछली घटनाओं का भी संज्ञान लिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसी घटनाएं मौजूद हैं जहाँ भगवान राम की मूर्तियों का अपमान किया गया या गणेश प्रतिमाएं तोड़ी गईं। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई न होना चिंताजनक है और यह दर्शाता है कि हिंदुओं पर स्पष्ट रूप से हमले किए गए। इस ऐतिहासिक फैसले ने अब तमिलनाडु की राजनीति में अभिव्यक्ति की आजादी और धार्मिक सम्मान की बहस को नया मोड़ दे दिया है।
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