Taslima Nasreen Return: प्रसिद्ध और बेबाक लेखिका तसलीमा नसरीन पूरे 19 वर्षों के लंबे और संघर्षपूर्ण अंतराल के बाद आखिरकार कोलकाता की सरजमीं पर वापस लौट आई हैं। उनके कोलकाता पहुंचने की खबर से साहित्यिक जगत और उनके प्रशंसकों में एक अलग ही हलचल और उत्साह देखने को मिल रहा है। तसलीमा नसरीन को आज से ठीक 19 साल पहले यानी वर्ष 2007 में मजबूरन यह शहर छोड़कर अचानक बाहर जाना पड़ा था, क्योंकि कट्टरपंथी संगठनों ने पश्चिम बंगाल में उनकी मौजूदगी का कड़ा विरोध किया था।

वर्ष 2007 में विरोध प्रदर्शन और वामपंथी सरकार का दबाव
साल 2007 में जब कट्टरपंथियों ने तसलीमा नसरीन के खिलाफ कोलकाता की सड़कों पर बड़े पैमाने पर उग्र विरोध प्रदर्शन और हिंसक प्रदर्शन किए, तब तत्कालीन वामपंथी सरकार ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्हें बंगाल से बाहर जाने का फरमान सुनाया था। उस समय मजबूर होकर उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा था, जिसके बाद से वह लगातार देश-विदेश में निर्वासित जीवन बिता रही थीं।

2011 में सत्ता परिवर्तन के बावजूद नहीं हो सकी थी वापसी
वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक सत्ता में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार आई, जिससे यह उम्मीद जगी थी कि शायद अब तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी का रास्ता साफ हो जाएगा। हालांकि, राजनीतिक समीकरणों और सुरक्षा कारणों के चलते टीएमसी के लंबे शासनकाल में भी उनकी वापसी संभव नहीं हो सकी और उनका यह इंतजार लगातार लंबा खिंचता चला गया।
महिला अधिकारों और कट्टरपंथ के खिलाफ बेबाक कलम
लेखिका तसलीमा नसरीन हमेशा से समाज में महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और उनके मुद्दों पर मुखर होकर लिखती रही हैं। इसके साथ ही उनकी कलम ने हमेशा धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास और कट्टरपंथ के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई है। उनकी यही बेबाकी और सच लिखने की आदत ही उनके जीवन में सबसे बड़ी मुसीबत की वजह बन गई, जिसके कारण उन्हें अपना देश और आशियाना छोड़ना पड़ा।
बांग्लादेश से पलायन और कोलकाता में नया ठिकाना
मूल रूप से बांग्लादेश की रहने वाली तसलीमा नसरीन को अपनी वैचारिक स्वतंत्रता के चलते एक समय बांग्लादेश से भी पलायन करने के लिए विवश होना पड़ा था। अपनी जान बचाकर वह भारत आईं और उन्होंने कोलकाता को अपना अस्थायी घर बनाया। कोलकाता की आबोहवा में उन्हें अपनी रचनाधर्मिता के लिए एक खुला आसमान मिला था, लेकिन वर्ष 2007 के विरोध प्रदर्शनों ने उनसे उनका यह आशियाना भी छीन लिया।
एयरपोर्ट पर लैंडिंग के साथ खत्म हुआ लंबा इंतजार
शुक्रवार को जैसे ही तसलीमा नसरीन ने कोलकाता एयरपोर्ट पर कदम रखा, उनके जीवन का एक लंबा और पीड़ादायक वनवास आखिरकार समाप्त हो गया। वह शहर में आयोजित होने वाले एक विशेष साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजन में हिस्सा लेने के लिए कोलकाता पहुंची हैं। इस बहुप्रतीक्षित यात्रा को लेकर तसलीमा नसरीन ने अपनी गहरी खुशी और संतोष सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से साझा किया है।
उपन्यास ‘लज्जा’ और ‘द्विखंडितो’ पर मचा था बड़ा बवाल
तसलीमा नसरीन के बहुचर्चिल उपन्यास ‘लज्जा’ को लेकर बांग्लादेश में कट्टरपंथियों द्वारा भारी उपद्रव और विरोध किया गया था, जिसमें उन्होंने एक हिंदू परिवार के उत्पीड़न की मार्मिक कहानी लिखी थी। इसके बाद जब उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द्विखंडितो’ प्रकाशित हुई, तब पश्चिम बंगाल में भी तीखा विवाद छिड़ गया। कट्टरपंथी संगठनों का यह आरोप था कि उनकी इस पुस्तक में इस्लाम धर्म का अपमान किया गया है और यह सीधे तौर पर ईशनिंदा के दायरे में आती है।
2003 की पुस्तक पर बंगाल सरकार द्वारा प्रतिबंध
कट्टरपंथियों के भारी दबाव के आगे झुकते हुए तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार ने वर्ष 2003 में प्रकाशित तसलीमा नसरीन की चर्चित पुस्तक ‘द्विखंडितो’ पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था। पिछले करीब ढाई दशकों से वह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में प्रवास करने को मजबूर थीं, और चाहकर भी अपने दो सबसे पसंदीदा ठिकानों यानी बांग्लादेश और बंगाल की धरती पर कदम नहीं रख पा रही थीं।
पुस्तक में बांग्लादेश के हालातों और फतवों का जिक्र
तसलीमा नसरीन ने अपनी पुस्तक ‘द्विखंडितो’ में अपने गृह देश बांग्लादेश के उस दौर के हालातों का बेहद सजीव और कड़वा सच बयां किया था। उनका स्पष्ट रूप से यह कहना था कि बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरता इस समय चरम सीमा पर पहुंच चुकी है, और इस सामाजिक उथल-पुथल का सबसे ज्यादा शिकार देश की महिलाएं ही बनती हैं। गांवों में आज भी गरीब महिलाएं स्थानीय मौलानाओं के तुगलकी फतवों और प्रताड़ना का शिकार होती हैं।
वर्तमान राजनीतिक बदलाव और बंगाल में नया माहौल
इस बीच, इसी साल पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है और राज्य में नई सरकार का गठन हुआ है। तसलीमा नसरीन की इस बहुप्रतीक्षित वापसी पर प्रतिक्रिया देते हुए सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं का कहना था कि पिछली सरकारों ने हमेशा तुष्टिकरण की राजनीति के चलते उन्हें बंगाल से बाहर रखा था, लेकिन अब राज्य में उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को पूरा संरक्षण मिलेगा और उन्हें किसी प्रकार का खतरा नहीं होगा।
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