Transatlantic Crisis
Transatlantic Crisis: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच ‘ग्रीनलैंड’ को लेकर चल रहा विवाद अब एक बेहद गंभीर मोड़ पर पहुँच गया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क पर अपना रुख और सख्त कर दिया है। ट्रंप के हालिया बयानों ने न केवल डेनमार्क बल्कि पूरे यूरोपीय संघ और नाटो (NATO) सहयोगियों के साथ अमेरिका के रिश्तों में दरार डाल दी है। वाशिंगटन और ब्रसेल्स के बीच बढ़ता यह तनाव वैश्विक राजनीति में एक नई अस्थिरता पैदा कर रहा है, जहाँ अमेरिका अपनी विस्तारवादी और आर्थिक दबाव की नीति को खुलकर प्रदर्शित कर रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक विवादास्पद पोस्ट के जरिए डेनमार्क और नाटो पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो दशकों से नाटो, डेनमार्क को यह चेतावनी दे रहा है कि ग्रीनलैंड से रूसी खतरे को दूर करना अनिवार्य है, लेकिन डेनमार्क इसमें पूरी तरह विफल रहा है। ट्रंप ने कड़े लहजे में कहा, “दुर्भाग्यवश, डेनमार्क कुछ नहीं कर सका। अब समय आ गया है और यह किया जाएगा!” उनके इस बयान का सीधा संकेत यह है कि अमेरिका अब सुरक्षा के नाम पर ग्रीनलैंड पर अपना प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण स्थापित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी इच्छा को पूरा करने के लिए ट्रंप अब आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने घोषणा की है कि यदि डेनमार्क और उसके सहयोगी देश ग्रीनलैंड की बिक्री पर बातचीत के लिए मेज पर नहीं आते हैं, तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। ट्रंप ने 1 फरवरी 2026 से डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूके, नीदरलैंड और फिनलैंड से आयात होने वाले सामान पर 10% टैरिफ लगाने का फरमान सुना दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने अल्टीमेटम दिया है कि यदि 1 जून तक कोई ठोस समझौता नहीं हुआ, तो इस टैक्स को बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा, जो यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा।
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जिसकी आबादी भले ही कम हो, लेकिन इसकी रणनीतिक अहमियत अतुलनीय है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण यह सैन्य, ऊर्जा और व्यापारिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ पिघलने से यहाँ नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जिससे चीन और रूस की नजरें भी इस क्षेत्र पर टिकी हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड दुर्लभ खनिज संसाधनों और तेल का भंडार माना जाता है। अमेरिका चाहता है कि वह यहाँ अपनी पकड़ मजबूत कर उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को पूरी तरह समाप्त कर दे।
ट्रंप की इस ‘टैरिफ वार’ की धमकी ने वैश्विक शेयर बाजारों और मुद्रा बाजार में खलबली मचा दी है। निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल है, जिसके कारण अमेरिकी डॉलर और स्टॉक फ्यूचर्स में गिरावट देखी जा रही है। वहीं, संकट के इस समय में लोग सुरक्षित निवेश के रूप में सोने (Gold), जापानी येन और स्विस फ्रैंक की ओर रुख कर रहे हैं। यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप के इस रवैये को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया है। अब देखना यह होगा कि क्या यूरोपीय देश ट्रंप के इस दबाव के आगे झुकते हैं या फिर दुनिया एक भीषण आर्थिक मंदी और व्यापारिक युद्ध की ओर बढ़ती है।
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