US-Iran Conflict
US-Iran Conflict: मध्य पूर्व में युद्ध के बादल गहराते जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शीर्ष सलाहकार ईरान के विरुद्ध एक नई और जटिल सैन्य रणनीति पर विचार कर रहे हैं। योजना यह है कि ईरान पर सीधी कार्रवाई करने के बजाय सबसे पहले इजरायल को हमला करने के लिए प्रेरित किया जाए। रणनीतिकारों का मानना है कि यदि इजरायल पहले कदम उठाता है और ईरान उस पर जवाबी पलटवार करता है, तो इससे अमेरिकी जनता के बीच ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए नैतिक और राजनीतिक समर्थन हासिल करना आसान हो जाएगा। इस ‘प्रोवोकेशन’ (उकसावे) की नीति के जरिए अमेरिका खुद को बचाव की मुद्रा में रखकर एक बड़े युद्ध की शुरुआत कर सकता है।
इस सैन्य हलचल को तब और मजबूती मिली जब हाल ही में इजरायल की धरती पर 12 अमेरिकी एफ-22 रैप्टर लड़ाकू विमानों के लैंड होने की खबरें सामने आईं। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के अनुसार, अमेरिका ने इतिहास में पहली बार इन अत्याधुनिक विमानों को सीधे इजरायल भेजा है। इसका उद्देश्य संभावित ईरानी जवाबी हमले से इजरायल और वहां तैनात अमेरिकी संपत्तियों की सुरक्षा करना है। सूत्रों का दावा है कि चाहे इजरायल पहले हमला करे या न करे, दोनों देश मिलकर एक संयुक्त सैन्य अभियान (Joint Military Operation) चलाने की तैयारी में हैं, जिसमें खुफिया जानकारी साझा करने से लेकर हवाई हमले तक शामिल हैं।
जहाँ एक ओर राजनीतिक सलाहकार हमले के पक्ष में हैं, वहीं अमेरिकी सैन्य नेतृत्व यानी पेंटागन के भीतर भारी चिंता देखी जा रही है। ‘पॉलिटिको’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ईरान पर हमलों के विकल्पों पर काम तो कर रहे हैं, लेकिन वे इसके पैमाने और जटिलता को लेकर सशंकित हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि अमेरिका ईरान के साथ एक लंबे और बड़े युद्ध में उलझ गया और उसके हथियारों का भंडार कम हुआ, तो चीन इस स्थिति का फायदा उठाकर ताइवान पर हमला कर सकता है। जनरल केन राष्ट्रपति ट्रंप के साथ सीधा टकराव टालते हुए सैन्य जोखिमों और राजनीतिक लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ अमेरिका और ईरान जिनेवा में परमाणु वार्ता को पुनर्जीवित करने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मध्य पूर्व में इराक युद्ध के बाद से अब तक का सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य जमावड़ा देखा जा रहा है। यह दोहरा रवैया स्थिति को और भी रहस्यमयी बना देता है। पेंटागन की आंतरिक बैठकों में जनरल केन ने स्पष्ट किया है कि ईरान पर हमला करना इराक या अफगानिस्तान जैसा नहीं होगा। ईरान की भौगोलिक स्थिति और उसकी सैन्य क्षमताएं अमेरिकी सैनिकों के लिए भारी नुकसान का सबब बन सकती हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान पर कोई बड़ा हमला होता है, तो वह अपनी पूरी ताकत से जवाब देगा। मध्य पूर्व में स्थित कई अमेरिकी सैन्य ठिकाने ऐसे हैं जिनके पास इजरायल की ‘आयरन डोम’ जैसी उन्नत सुरक्षा प्रणाली नहीं है। ऐसे में ईरान की मिसाइलें और ड्रोन अमेरिकी सैनिकों के लिए सीधा खतरा बन सकते हैं। यह न केवल एक मानवीय त्रासदी होगी, बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप के लिए एक बड़ा राजनीतिक जोखिम भी साबित हो सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति इस संभावित महायुद्ध को टाल पाएगी या क्षेत्र एक नए विनाश की ओर बढ़ेगा।
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